#N D jalan में बसपा का ‘पैराशूट’ दांव! प्रत्याशी घोषित होते ही सियासी पारा चढ़ा*
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जालौन मैट्रो संपादक आशुतोष द्विवेदी "आशु सफल" ✍️
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माधौगढ़ के अमृता पैलेस में कल रविवार को बहुजन समाज पार्टी के सम्मेलन में जैसे ही 2027 विधानसभा चुनाव के लिए कुरौली निवासी प्रॉपर्टी डीलर आशीष पांडेय के नाम का ऐलान हुआ, सभागार तालियों से गूंज उठा—
लेकिन बाहर निकलते ही चर्चाओं का बाजार भी गर्म हो गया।
वजह?
क्षेत्र की सियासत में यह सवाल तेजी से तैरने लगा कि क्या एक बार फिर “पैराशूट प्रत्याशी” मैदान में उतारा गया है।
घोषणा के साथ ही यह भी बताया गया कि आशीष पांडेय बुंदेलखंड के पहले घोषित प्रत्याशी हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं ने इसे रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक बताया, मगर स्थानीय स्तर पर कई लोग दबी जुबान में अलग ही कहानी कहते नजर आए। कुछ का तर्क है कि माधौगढ़ की जनता से जिनका सीधा सरोकार या लंबा सामाजिक जुड़ाव नहीं रहा, उन्हें अचानक टिकट मिलना कई सवाल खड़े करता है।
सियासी गलियारों में तंज भी उड़ रहे हैं। लोग कहते सुनाई दे रहे हैं कि बसपा नेता बनाने की “ओपन यूनिवर्सिटी” चलाती है—धन और समीकरण हो तो डिग्री मिलना तय!
माधौगढ़ की सियासत में कल से एक नई चर्चा चटखारे लेकर तैर रही है।
कहा जा रहा है कि अब जनसेवा की लंबी तपस्या, संघर्ष की धूप और जनता के सुख-दुख में भागीदारी की कोई अनिवार्यता नहीं रह गई। बस आंखें मूंदिए, पार्टी का टिकट थामिए और देखते ही देखते “रेडीमेड नेता जी” का तमगा पाइए।
गलियारों में यह फुसफुसाहट भी है कि समाज हित की जमीन पर पसीना बहाने से कहीं आसान है सीधे सियासी मंच पर अवतार ले लेना।
जनता सवाल कर रही है—क्या जनप्रतिनिधि बनने के लिए वर्षों का जुड़ाव जरूरी है या केवल टिकट ही पर्याप्त योग्यता बन चुका है? चौपालों से लेकर चौराहों तक चर्चा गर्म है। मतदाता अब चेहरे नहीं, चरित्र और सरोकार तौलने की बात कर रहे हैं। सियासत की इस नई रेसिपी में मसाला भले तेज हो, लेकिन असली स्वाद तो जनता का विश्वास ही तय करेगा।
हालांकि यह सिर्फ आरोप और चर्चाएं हैं, लेकिन इन चर्चाओं ने माहौल को दिलचस्प जरूर बना दिया है।
बताया जाता है कि आशीष पांडेय मूल रूप से जालौन के कुरौली गांव के निवासी हैं, पर उनका व्यवसाय ग्वालियर जैसे शहर में फैला है। विरोधियों का दावा है कि उन्होंने क्षेत्र में कोई बड़ा सामाजिक कार्य नहीं किया, जबकि समर्थक कहते हैं कि नया चेहरा ही नई राजनीति की शुरुआत करता है। ब्राह्मण चेहरे के रूप में उनकी पहचान को भी राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
अब असली सवाल यही है—क्या माधौगढ़ की जनता बाहरी छवि वाले उम्मीदवार पर भरोसा करेगी, या फिर पुराने और चर्चित स्थानीय चेहरे को तरजीह देगी? 2027 भले दूर हो, लेकिन सियासी शतरंज की बिसात अभी से बिछ चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि यह “पैराशूट दांव” उड़ान भरता है या जमीन पर ही अटक जाता है।


