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#ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਰਵੀਦਾਸ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ #ਗੁਰੂ ਰਵੀਦਾਸ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ ਦਾ ਜਨਮ ਦਿਹਾੜਾ #ਗੁਰੂ ਰਵੀਦਾਸ #🙏ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਰਵੀਦਾਸ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ🙏
ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਰਵੀਦਾਸ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ - संत रविदास का परिचय नाम = संत रविदास उपनाम = रैदास जन्म = १३९८ ई. गोवर्धनपुरा  (वाराणसी) তন্স-থান = ೧೬ মূন্তু = 1528 $ বাযতামী मृत्यु-स्थान = पिता = संतोरख दास देवी माता = कलसा मीराबाई शिष्या = निर्गुण 97h = ब्रह्म की जाति = चमार (जाटव) गुरु = रामानन्द और कबीर साहेब दार्शनिक, समाज सुधारक और मोची संत,  पेशा = भाषा-शैली = अवधी , राजस्थानी, खडी बोली, उर्दू सामान्य परिचय = संत रविदास के जन्म के विषय में विभिन्न भ्रांतियां নিম্লান  है। कुछ इनका जन्म १३७७ ई. तथा कुछ १३७८ ई. तथा कुछ विद्वान १३९८ ई. मानते हैं। रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान याप्त किया  प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन ক নম্ভূন था। ये निर्गुण संप्रदाय थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतःप्रोत थी। मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा जैसे भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की बिल्कुल दिखावों में रविदास का आंतरिक भावनाओं और आपसी भाई-चारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। रविदास को उपमा और रूपक अलंकार से विशेष प्रेम था। सीधे-साधे व्यदों में संत कवि ने हृदय के भाव् बड़ी सफाई से प्रकट किए ! संत रविदास का परिचय नाम = संत रविदास उपनाम = रैदास जन्म = १३९८ ई. गोवर्धनपुरा  (वाराणसी) তন্স-থান = ೧೬ মূন্তু = 1528 $ বাযতামী मृत्यु-स्थान = पिता = संतोरख दास देवी माता = कलसा मीराबाई शिष्या = निर्गुण 97h = ब्रह्म की जाति = चमार (जाटव) गुरु = रामानन्द और कबीर साहेब दार्शनिक, समाज सुधारक और मोची संत,  पेशा = भाषा-शैली = अवधी , राजस्थानी, खडी बोली, उर्दू सामान्य परिचय = संत रविदास के जन्म के विषय में विभिन्न भ्रांतियां নিম্লান  है। कुछ इनका जन्म १३७७ ई. तथा कुछ १३७८ ई. तथा कुछ विद्वान १३९८ ई. मानते हैं। रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान याप्त किया  प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन ক নম্ভূন था। ये निर्गुण संप्रदाय थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतःप्रोत थी। मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा जैसे भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की बिल्कुल दिखावों में रविदास का आंतरिक भावनाओं और आपसी भाई-चारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। रविदास को उपमा और रूपक अलंकार से विशेष प्रेम था। सीधे-साधे व्यदों में संत कवि ने हृदय के भाव् बड़ी सफाई से प्रकट किए ! - ShareChat