बोझ एक जैसा, पर मंज़िलें जुदा!
यह तस्वीर हमारे समाज के उस दोहरे चेहरे को उजागर करती है जिसे हम अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। एक ही सड़क पर दो तरह का बचपन चल रहा है एक 'कल' बनाने निकला है, और दूसरा 'आज' बचाने।
तार्किक विश्लेषण:
* अवसरों की खाई: दोनों बच्चों के कंधों पर वजन बराबर है, लेकिन एक के बैग में 'ज्ञान' है जो उसे ऊंचाइयों पर ले जाएगा, और दूसरे के बोरे में 'मजबूरी' है जो उसे गरीबी के चक्रव्यूह में बांधे रखेगी।
* बचपन बनाम जिम्मेदारी: जहाँ एक उम्र सीखने और खेलने की है, वहां संसाधनों के अभाव में एक मासूम का बचपन 'रोटी की खोज' की भेंट चढ़ गया है।
* सामाजिक विडंबना: हम डिजिटल इंडिया और प्रगति की बातें तो करते हैं, लेकिन असल प्रगति तब होगी जब शिक्षा का अधिकार सिर्फ 'सुविधा' नहीं, बल्कि हर बच्चे की 'हकीकत' बनेगा।
निष्कर्ष:
असमानता सिर्फ पैसों की नहीं होती, अवसरों की होती है। एक बच्चा इसलिए पीछे नहीं है कि उसमें काबिलियत कम है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसकी दौड़ का 'स्टार्टिंग पॉइंट' हमसे बहुत पीछे है।
सोचिए: क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ जन्म से ही तय हो जाता है कि कौन उड़ेगा और कौन बोझ ढोएगा?
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