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#❤️जीवन की सीख : संत कबीरदास जी के अनुसार ये सभी अवगुण आत्मा को परमात्मा से दूर ले जाते हैं। कुछ अवगुण जो हम इंसानों को हमेशा दुख देते है । दुख के दरवाजे । जो प्रवेश ( अंदर जाना चाहता है ) करना चाहता है कर सकता है । --- 1. गुस्सा 1. गुस्सा मन की असंतुलित अवस्था है। 2. यह क्षणिक उत्तेजना से उत्पन्न होता है। 3. परमपिता परमात्मा के अनुसार यह बुद्धि को ढक देता है। 4. गुस्से में व्यक्ति सही-गलत का भेद खो देता है। 5. यह संबंधों को तोड़ देता है। 6. भक्ति मार्ग में गुस्सा बाधा है। 7. विनम्रता से ही गुस्सा शांत होता है। 8. संत के लिए क्षमा, गुस्से का उपचार है। 2. क्रोध 1. क्रोध गुस्से का स्थायी और तीव्र रूप है। 2. यह अहंकार से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे अग्नि के समान बताते हैं। 4. क्रोध पहले स्वयं को जलाता है। 5. इससे विवेक नष्ट हो जाता है। 6. आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है। 7. क्रोधी व्यक्ति अशांत रहता है। 8. प्रेम और धैर्य से क्रोध शांत होता है। 3. हिंसा 1. हिंसा मन, वचन और कर्म से हो सकती है। 2. यह दया के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा दया को धर्म का मूल मानते हैं। 4. हिंसा हृदय को कठोर बनाती है। 5. इससे पाप बढ़ता है। 6. समाज में भय फैलता है। 7. हिंसक मनुष्य ईश्वर से दूर होता है। 8. करुणा ही इसका समाधान है। 4. द्वेष 1. द्वेष मन में छिपी शत्रुता है। 2. यह ईर्ष्या और अहं से उत्पन्न होता है। 3. परमपिता परमात्मा प्रेम को इसका उपचार बताते हैं। 4. द्वेष मन को अशांत करता है। 5. इससे संबंध बिगड़ते हैं। 6. यह आत्मा को दूषित करता है। 7. द्वेषी व्यक्ति सुखी नहीं रहता। 8. क्षमा से द्वेष समाप्त होता है। --- 5. बदला 1. बदला प्रतिशोध की प्रारंभिक भावना है। 2. यह चोट या अपमान से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा क्षमा को श्रेष्ठ मानते हैं। 4. बदला शांति नहीं देता। 5. यह द्वेष को बढ़ाता है। 6. मन में अशांति बनी रहती है। 7. बदले की आग जीवन जला देती है। 8. संत मार्ग क्षमा का मार्ग है। 6. प्रतिशोध 1. प्रतिशोध बदले का संगठित रूप है। 2. यह अहंकार को संतुष्ट करता है। 3. पर आत्मा को कलुषित करता है। 4. परमपिता परमात्मा इसे अज्ञान का परिणाम मानते हैं। 5. इससे हिंसा जन्म लेती है। 6. प्रतिशोध चक्र चलता ही रहता है। 7. शांति नहीं मिलती। 8. प्रेम ही इसे समाप्त करता है। 7. अहंकार 1. अहंकार “मैं” की भावना है। 2. परमपिता परमात्मा कहते हैं जहाँ “मैं” है, वहाँ ईश्वर नहीं। 3. यह आध्यात्मिक बाधा है। 4. अहंकार विनम्रता को नष्ट करता है। 5. इससे दूरी और अलगाव बढ़ता है। 6. ज्ञान प्राप्ति में बाधा बनता है। 7. संत सरल और निरहंकारी होता है। 8. समर्पण से अहंकार मिटता है। 8. घमंड 1. घमंड अहंकार का बाहरी रूप है। 2. यह धन, ज्ञान या शक्ति पर होता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे नाश का कारण बताते हैं। 4. घमंडी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझता है। 5. इससे समाज में दूरी बढ़ती है। 6. घमंड अस्थायी वस्तुओं पर आधारित है। 7. समय सब छीन लेता है। 8. विनम्रता ही सच्ची महानता है। ---