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भागवत पुराण - भगवद्गीता अध्याय १२: भक्ति का श्रेष्ठ मार्ग कौन सा है?  पूछते हैं कि यह इन्फोग्राफिक अर्जुन की जिज्ञासा से शुरू होता है, जिसमें वे भगवान कृष्ण से रूप की पूजा " कौन श्रेष्ठ है ~ जो आपके साकार (सगुण) करते हैं या जो आपके अविनाशी, निराकार (निर्गुण) रूप की उपासना करते हैं? इन्फोग्राफि कृष्ण के उत्तर को सारांशित करता है। निर्गुण उपासना सगुण उपासना रूप की पूजा)  (निराकार रूप की पूजा ) (साकार जो भक्त मन को मुझमें एकाग्र करके जो इंद्रियों को वश में करके अविनाशी, श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं। सर्वव्यापी और अचिन्त्य ब्रहा की उपासना करते हैं। परम RIகRHPf भगवान का निर्णयः अधिक कठिन क्यों है? सगुण मार्ग श्रेष्ठतम है जिनका मन अव्यक्त (निराकार ) कृष्ण के अनुसार, साकार में आसक्त है॰ उन्हें अधिक क्लेश रूप के प्रेमी भक्त " युक्ततम" होता है क्योंकि देह अभिमानी (अत्यधिक श्रेष्ठ) हैं। के लिए यह गति दुःख से प्राप्त होती है। भगवान को प्रिय भक्त के लक्षण समभाव और क्षमा ঠপ ২্টিন, মন্সী अहंकार और संतोषी और दृढ़ निश्वयी ममता से रहित ாக जो सुख दुःख मान अपममननरैहतेह्रँऔत्र में जो किसी भी प्राणी से जो  मै॰ और मेरेपन कैे जो हर परिस्थिति में भाव से मुक्त हैं और किसी  समान रहते और निरंतर संतुष्ट रहते हैं और द्वेष नहीं करते , सबके मित्र क्षमाशील हें। हैं और करुणा से भरे हैं। भी चीज़ में आसक्ति नहीं जिनका निश्वय दृढ़ है।  रखत। NotebookLM भगवद्गीता अध्याय १२: भक्ति का श्रेष्ठ मार्ग कौन सा है?  पूछते हैं कि यह इन्फोग्राफिक अर्जुन की जिज्ञासा से शुरू होता है, जिसमें वे भगवान कृष्ण से रूप की पूजा " कौन श्रेष्ठ है ~ जो आपके साकार (सगुण) करते हैं या जो आपके अविनाशी, निराकार (निर्गुण) रूप की उपासना करते हैं? इन्फोग्राफि कृष्ण के उत्तर को सारांशित करता है। निर्गुण उपासना सगुण उपासना रूप की पूजा)  (निराकार रूप की पूजा ) (साकार जो भक्त मन को मुझमें एकाग्र करके जो इंद्रियों को वश में करके अविनाशी, श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं। सर्वव्यापी और अचिन्त्य ब्रहा की उपासना करते हैं। परम RIகRHPf भगवान का निर्णयः अधिक कठिन क्यों है? सगुण मार्ग श्रेष्ठतम है जिनका मन अव्यक्त (निराकार ) कृष्ण के अनुसार, साकार में आसक्त है॰ उन्हें अधिक क्लेश रूप के प्रेमी भक्त " युक्ततम" होता है क्योंकि देह अभिमानी (अत्यधिक श्रेष्ठ) हैं। के लिए यह गति दुःख से प्राप्त होती है। भगवान को प्रिय भक्त के लक्षण समभाव और क्षमा ঠপ ২্টিন, মন্সী अहंकार और संतोषी और दृढ़ निश्वयी ममता से रहित ாக जो सुख दुःख मान अपममननरैहतेह्रँऔत्र में जो किसी भी प्राणी से जो  मै॰ और मेरेपन कैे जो हर परिस्थिति में भाव से मुक्त हैं और किसी  समान रहते और निरंतर संतुष्ट रहते हैं और द्वेष नहीं करते , सबके मित्र क्षमाशील हें। हैं और करुणा से भरे हैं। भी चीज़ में आसक्ति नहीं जिनका निश्वय दृढ़ है।  रखत। NotebookLM - ShareChat