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#भगवत गीता #भगवत गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓
भगवत गीता - श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिद रूपं दृष्टँवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्य द्शनकाङ्क्षिणः  श्री भगवान बोले- मेरा जो चतूर्भज रूप तूमने देखा है चह सुदुदशहै अ्थत् इसके दशन बड़ ही दुलभ है। देवता भीसदा इस रूप के द्शन की आकांक्षा करते रहते है ||52|| व्याख्याः भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में अर्जून से कहते हैं कि आपने जो विराट रूप देखा है वह अत्यंत दुर्लभ है। यह रूप देवताओक लिएभी सदा द्शनका इच्छा खख़ने वाला होता है लेकिन वे भी इस प्रतिदिन नहीं देख सकते। इस विराट रूप का दर्शन क लिए विशेष योग्यता और परम धामिकता कखन की आवश्यकता हतीहै। इसलिए इस दिव्य रूप 5چ कोदेखना आपके एक बहत ही विशेष अनूभव क लिए संभव नहीं होता। है॰जो साधारण श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिद रूपं दृष्टँवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्य द्शनकाङ्क्षिणः  श्री भगवान बोले- मेरा जो चतूर्भज रूप तूमने देखा है चह सुदुदशहै अ्थत् इसके दशन बड़ ही दुलभ है। देवता भीसदा इस रूप के द्शन की आकांक्षा करते रहते है ||52|| व्याख्याः भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में अर्जून से कहते हैं कि आपने जो विराट रूप देखा है वह अत्यंत दुर्लभ है। यह रूप देवताओक लिएभी सदा द्शनका इच्छा खख़ने वाला होता है लेकिन वे भी इस प्रतिदिन नहीं देख सकते। इस विराट रूप का दर्शन क लिए विशेष योग्यता और परम धामिकता कखन की आवश्यकता हतीहै। इसलिए इस दिव्य रूप 5چ कोदेखना आपके एक बहत ही विशेष अनूभव क लिए संभव नहीं होता। है॰जो साधारण - ShareChat