💔 “माँ, बस 10 मिनट और…”
सुबह के 4 बज रहे थे।
घर के आँगन में हल्की ठंडक थी। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी। माँ चुपचाप रोटी सेंक रही थी। हर बार की तरह आज भी वो ज्यादा बोल नहीं रही थी… क्योंकि उसे पता था — आज बेटे की छुट्टी खत्म हो रही है।
सुशील बैग पैक कर रहा था।
वही हरा बैग… जिसमे हमेशा घर की खुशबू कुछ दिनों के लिए बंद हो जाती है।
दीवार पर टंगी उसकी वर्दी को वह एक पल के लिए देखता है। फिर माँ की तरफ।
“माँ, बस 10 मिनट और बैठ जाऊँ?”
माँ मुस्कुरा देती है —
“ड्यूटी के लिए कभी देर मत करना बेटा।”
उसकी आवाज़ मजबूत थी… लेकिन आँखें नहीं।
🏠 वो 15 दिन…
ये 15 दिन कैसे बीते, किसी को पता ही नहीं चला।
पहले दिन जब सुशील आया था, पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था। बच्चों ने “फौजी भैया” कहकर घेर लिया था। पिता ने छाती चौड़ी करके सबको बताया — “मेरा बेटा बॉर्डर पर है।”
माँ ने उसके लिए गाजर का हलवा बनाया था।
बहन ने मोबाइल में सेल्फी भरी थीं।
और नेहा … बस चुपचाप उसे देखती रही थी।
नेहा उसकी पत्नी थी। शादी को अभी एक साल ही हुआ था। आधा समय फोन पर बीता, आधा इंतज़ार में।
इन 15 दिनों में सुशील ने कोशिश की कि हर पल जी ले।
माँ के साथ बाजार गया।
पिता के साथ खेत तक चला।
नेहा के साथ छत पर बैठकर चाँद देखा।
लेकिन हर हँसी के पीछे एक साया था —
“छुट्टी खत्म होने वाली है…”
💔 आखिरी रात
आखिरी रात सबसे भारी होती है।
घर में सब जल्दी सो गए थे… पर किसी को नींद नहीं आई।
नेहा ने धीरे से पूछा —
“इस बार कितने महीनों बाद आओगे?”
सुशील कुछ पल चुप रहा।
“पता नहीं… पोस्टिंग बदल सकती है।”
नेहा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“डर लगता है…”
सुशील ने मुस्कुराकर कहा —
“डरना मत। फौजी का वादा है।”
लेकिन वह जानता था —
फौजी वादा करता है, पर किस्मत नहीं।
🌅 वो सुबह
सुबह जब जीप घर के बाहर आकर रुकी…
माँ की सांस अटक गई।
सुशील ने वर्दी पहनी।
जूते कसकर बांधे।
आईने में खुद को देखा।
वह वही बेटा था…
लेकिन अब घर का नहीं, देश का भी था।
माँ ने तिलक लगाया।
हाथ काँप रहे थे।
“खाना समय पर खाना…”
वो हर बार यही कहती थी।
पिता ने कंधे पर हाथ रखा —
“सीना ऊँचा रख।”
बहन रो पड़ी।
नेहा चुप थी।
जब सब गले मिले, सुशील ने आखिरी बार घर की दीवारों को देखा।
वो कमरा… वो आँगन… वो दरवाज़ा…
सब जैसे उसे रोकना चाहते थे।
🚙 जाते वक्त
जीप चल पड़ी।
माँ पीछे भागी नहीं।
वो बस खड़ी रही… जब तक जीप आँखों से ओझल नहीं हो गई।
Neha ने धीरे से कहा —
“माँ, वो फिर आएँगे।”
माँ ने आँसू पोंछे —
“हाँ… फौजी का घर लौटना जरूरी है।”
लेकिन हर बार लौटना लिखा हो — ये जरूरी नहीं।
📱 रास्ते में मैसेज
कुछ देर बाद sushil का फोन बजा।
नेहा का मैसेज था —
“घर खाली लग रहा है।”
सुशील ने जवाब दिया —
“दिल मजबूत रखो। तुम हो इसलिए मैं मजबूत हूँ।”
फिर उसने फोन जेब में रखा और बाहर देखा।
रास्ते बदल रहे थे।
घर की मिट्टी की खुशबू पीछे छूट रही थी।
फिर वही ड्यूटी।
वही बॉर्डर।
वही ठंडी हवाएँ।
🏔 पोस्ट पर पहुँचकर
जब सुशील पोस्ट पर पहुँचा, साथियों ने मुस्कुराकर स्वागत किया।
“आ गए छुट्टी मनाकर?”
उसने हल्की मुस्कान दी।
“हाँ… अब असली ड्यूटी शुरू।”
रात को जब वह बंकर में लेटा, उसने जेब से घर की एक छोटी सी फोटो निकाली।
माँ, पिता, नेहा — सब एक फ्रेम में।
उसने फोटो को सीने से लगाया।
और पहली बार… आँखें बंद करके चुपचाप रोया।
🇮🇳 सच्चाई
फौजी छुट्टी पर हँसता है…
लेकिन छुट्टी खत्म होने का दर्द अंदर ही अंदर खाता है।
हर बार जब वो घर से निकलता है,
उसे नहीं पता — अगली बार वापसी होगी या तिरंगे में।
फिर भी वो जाता है।
क्योंकि उसके लिए घर से बड़ा कुछ है —
देश।
❤️ आखिरी पंक्तियाँ
जब अगली बार आप किसी फौजी को मुस्कुराते देखें,
तो समझिए —
उस मुस्कान के पीछे कितनी विदाइयाँ छुपी हैं।
छुट्टी खत्म होना सिर्फ तारीख बदलना नहीं होता…
वो दिल का एक हिस्सा पीछे छोड़ आना होता है।
🇮🇳
क्योंकि फौजी का हर जाना —
एक छोटी सी जंग होती है।
घर के साथ…
खुद के साथ…
और किस्मत के साथ।
जय हिन्द 🇮🇳🇮🇳🌹🌹🚩🙏
#I ❤️️ इंडियन आर्मी 🇮🇳 #🎖️देश के जांबाज #🎖️देश के सिपाही #🙏 जवानों को सलाम #💓 फ़ौजी के दिल की बातें @sushil sahiba shingh 🥰


