चित्र असत्य नहीं बोलते...
इस चित्र का सूक्ष्मता से अवलोकन कीजिए! यह अस्सी के दशक का ऐतिहासिक दृश्य है, जब ईरान के अयातुल्ला खामेनेई ने कश्मीर का भ्रमण किया था।
श्रीनगर की जामिया मस्जिद के मंच पर उनके साथ अलगाववादी मीरवाइज मौलवी फारूक आसीन है। यह वही कालखंड था जब कश्मीर की पावन धरा पर पृथकतावाद के विषैले बीज बोए जा रहे थे और खामेनेई वहां 'इस्लामी क्रांति' के नाम पर कट्टरपंथ का उद्बोधन दे रहे थे।
खामेनेई ने सदैव भारत की अखंडता को चुनौती देते हुए कश्मीर की तुलना गाजा और अफगानिस्तान से की और इसे एक "उत्पीड़ित मुस्लिम राष्ट्र" के रूप में प्रचारित किया। इनका एकमात्र ध्येय विध्वंसक परमाणु अस्त्रों का निर्माण और कट्टरपंथी विचारधारा का विस्तार रहा है। आज जब अमेरिका और इजरायल 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के अंतर्गत इनके नौसैनिक पोतों को जलसमाधि दे रहे हैं और इनके सामरिक ठिकानों को भग्नावशेषों में परिवर्तित कर रहे हैं, तो भारत के कुछ विषैले वामपंथी विषाणु से ग्रस्त तथाकथित "बुद्धिजीवी" और राष्ट्र विरोधी विपक्षी नेता इनके समर्थन में विलाप कर रहे हैं।
आश्चर्य का विषय है कि जो व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से भारत को खंडित करने के प्रयासों का पक्षधर रहा, आज हमारे देश का एक विशिष्ट वर्ग उसे अपना रहबर "रक्षक" मानकर संताप व्यक्त कर रहा है।
क्या आपको भी विपक्ष की यह कार्यशैली मात्र राजनीतिक विवशता लगती है अथवा विषैले वामपंथी विषाणु से ग्रस्त कुछ समूहों और विक्षिप्त मानसिकता वाले विपक्ष का राष्ट्रविरोधी शक्तियों के प्रति नैसर्गिक अनुराग...?
जो लोग प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को प्रभावहीन बताते हैं, वही आज प्रलाप कर रहे हैं कि इजरायल ने यह आक्रमण प्रधानमंत्री के परामर्श पर ही किया है। यह वैचारिक पाखंड की पराकाष्ठा है।
हमें यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि राष्ट्र के स्वाभिमान और सुरक्षा से श्रेष्ठ कोई मत या विचारधारा नहीं हो सकती। जो व्यक्ति हमारे राष्ट्र के विखंडन का स्वप्न देखने वालों के साथ खड़ा था, आज वह अपने कुकर्मों का प्रतिफल भोग चुका/रहा है।
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