क्षणभंगुर जीवन
#कबीर, यह जग कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ।
काल्ह जो बैठा मंडपे, आज मसाने दीठ॥
भावार्थ (Meaning):
संत कबीर दास जी इस दोहे में जीवन की अनिश्चितता और संसार के दिखावे की नश्वरता का बहुत मार्मिक चित्रण करते हैं।
कबीर जी कहते हैं कि यह संसार वास्तव में कुछ भी नहीं है (सारहीन है)। इसका स्वभाव बड़ा विचित्र है, यह पल भर में खारा (कड़वा या दुखदायी) लगता है और अगले ही पल मीठा (सुखदायी) लगने लगता है। यहाँ सुख और दुख का खेल चलता रहता है।
जीवन इतना क्षणभंगुर है कि जो व्यक्ति कल तक विवाह के मंडप में या राजसी ठाठ-बाट के साथ महल में बैठा था, आज उसे ही 'मसाने' यानी शमशान (मरघट) में देखा जा रहा है। भाव यह है कि कल का राजा या दूल्हा, आज मिट्टी की ढेर बन गया है। मृत्यु अटल है और वह समय या स्थान नहीं देखती।
शिक्षा (Moral):
हमें संसार के क्षणिक सुख-दुख और झूठी शान-शौकत पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि मृत्यु निश्चित है। इस जीवन का कोई भरोसा नहीं, इसलिए समय रहते ईश्वर का सुमिरन कर लेना चाहिए।
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