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राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत युवा जागरण का अग्रदूत "जय विजय" मासिक पत्रिका में प्रकाशित @drmullaadamali की कविताएँ #कविता #मेरी कविता #kavita #poetry
कविता - राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत युवा जागरण का अग्रदूत RNIno UPHIN45193/24/1/2014  जय विजय সামিক जंगलथये जंगल हरियाली का धर सुबह की एक कोमल गीत प्रकृति है বভা কী চ্ায়া ল্নিয়রা কা ব্েহ हर किरण में बसता है जीवन का मीत पछी जो चहके , जैेसे गीत गाएँ की बूँदें जैसे मोती हों धरती पर ओस हर कोना बोले बस शाति सुनाएँ  हवा भी चलती है प्रेम की लहर भर झरनों की बा्ते फूलों की खुशबू घरती को गोदी ने सजी है सबू पंछी चहचहाते हैं स्वागत में प्रभात का हिरन की छलांगे मोर की अदा से महकता है आँगन दिन के साथ का फूलों काथे रूपहे सबसे जुदा  प्रकृति सूरज मुस्काता है पहाड़ियों के पार, नीभ पीपल साल बंबूल  खड़े हे प्रहरी ब्न रहते हॅ फूल  जिग जा अब संसार" मानो कहता हा कृ 01. m331 ೮7 पेड़ों की शाखों पर नाचते हैं सपने uHdನ ٧٩ ٥  ١ ٤ ٤ ٦٧١ ٧٩ ٩ذ١ ٤ ٧١٤١ हर पत्ता कहता है कृ "चलो कुछ अपने" 4೪ &r೪ ೩ ೯ 3೯ ೭ Gllಕ 21*7 नदी की कल कल है गीत गुनगुनाती  नानव की लालच ने इसेनीनारा जैसे कोई माँ सुना रही हो सौगात कटते ह पेड़ सिनटती ह राहे घटती हॅ सासें निटती ह चाहें सुबह की ये शांत पावन नई प्रकृति सनाला इसे बचालो इस् हर दिल में भरती है उम्मीदें कई जंगल की पुकार को सुनो जरा  इसकी मौन ज़बान ये सांसें हेॅ अपनीः ये जीवरन का रंग  जो समझ सके जँंगल ये जंगल. हे घरती का संग  उसे मिल जाए जीवन का वरदान डॉ॰ मुल्ला आदम अली डॉ. मुल्ला आदम अली राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत युवा जागरण का अग्रदूत RNIno UPHIN45193/24/1/2014  जय विजय সামিক जंगलथये जंगल हरियाली का धर सुबह की एक कोमल गीत प्रकृति है বভা কী চ্ায়া ল্নিয়রা কা ব্েহ हर किरण में बसता है जीवन का मीत पछी जो चहके , जैेसे गीत गाएँ की बूँदें जैसे मोती हों धरती पर ओस हर कोना बोले बस शाति सुनाएँ  हवा भी चलती है प्रेम की लहर भर झरनों की बा्ते फूलों की खुशबू घरती को गोदी ने सजी है सबू पंछी चहचहाते हैं स्वागत में प्रभात का हिरन की छलांगे मोर की अदा से महकता है आँगन दिन के साथ का फूलों काथे रूपहे सबसे जुदा  प्रकृति सूरज मुस्काता है पहाड़ियों के पार, नीभ पीपल साल बंबूल  खड़े हे प्रहरी ब्न रहते हॅ फूल  जिग जा अब संसार" मानो कहता हा कृ 01. m331 ೮7 पेड़ों की शाखों पर नाचते हैं सपने uHdನ ٧٩ ٥  ١ ٤ ٤ ٦٧١ ٧٩ ٩ذ١ ٤ ٧١٤١ हर पत्ता कहता है कृ "चलो कुछ अपने" 4೪ &r೪ ೩ ೯ 3೯ ೭ Gllಕ 21*7 नदी की कल कल है गीत गुनगुनाती  नानव की लालच ने इसेनीनारा जैसे कोई माँ सुना रही हो सौगात कटते ह पेड़ सिनटती ह राहे घटती हॅ सासें निटती ह चाहें सुबह की ये शांत पावन नई प्रकृति सनाला इसे बचालो इस् हर दिल में भरती है उम्मीदें कई जंगल की पुकार को सुनो जरा  इसकी मौन ज़बान ये सांसें हेॅ अपनीः ये जीवरन का रंग  जो समझ सके जँंगल ये जंगल. हे घरती का संग  उसे मिल जाए जीवन का वरदान डॉ॰ मुल्ला आदम अली डॉ. मुल्ला आदम अली - ShareChat