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☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ६☀️ पृष्ठ ७☀️
नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई ।
प्रीति रही कछु बरनि न जाई ॥
मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ ॥१॥
[सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! बालि और में दो भाई हैं। हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती। हे प्रभो! मय दानव का एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। एक बार वह हमारे गाँव में आया ॥१॥
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहइ न पारा ॥
धावा बालि देखि सो भागा।मैं पुनि गयउँ बंधु सँगलागा॥२॥
उसने आधी रातको नगरके फाटकपर आकर ललकारा। बालि शत्रुके बल (ललकार) को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देख कर मायावी भागा। मैं भी भाई के सङ्ग लगा चला गया ॥२॥
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई ॥
परिखेसु मोहि एक पखवारा।नहिंआवौं तब जानेसु मारा॥३॥
वह मायावी एक पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने मुझे समझा कर कहा- तुम एक पखवाड़े (पंद्रह दिन) तक मेरी बाट देखना। यदि में उतने दिनों में न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया ॥३॥
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी ॥
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई।
सिला देइ तहँ चलेउँ पराई ॥४॥
हे खरारि! मैं वहाँ महीने भर तक रहा। वहाँ (उस गुफा में से) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। तब [मैंने समझा कि उसने बालि को मार डाला, अब आ कर मुझे मारेगा। इस लिये मैं वहाँ (गुफा के द्वार पर) एक शिला लगा कर भाग आया॥४॥
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं ॥
बाली ताहि मारि गृहआवा।देखिमोहि जियेंभेद बढ़ावा॥५॥
मन्त्रियों ने नगर को बिना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मार कर घर आ गया। मुझे [राजसिंहासन पर] देख कर उसने जी में भेद बढ़ाया (बहुत ही विरोध माना)। [उसने समझा कि यह राज्य के लोभ से ही गुफा के द्वार पर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा] ॥५॥
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी ।
हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी ॥
ताकें भय रघुबीर कृपाला।सकलभुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥६॥
उसने मुझे शत्रु के समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्री को भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर ! मैं उसके भय से समस्त लोकों में बेहाल हो कर फिरता रहा॥६॥
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं ॥
सुनि सेवक दुख दीनदयाला ।
फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला ॥७॥
वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। सेवक का दुःख सुन कर दीनों पर दया करने वाले श्रीरघुनाथजी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं ॥७॥
दो०- सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान ।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ॥६॥
[उन्होंने कहा- हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे ॥६॥
#सीताराम भजन


