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#शुभ सकाळ #🎭Whatsapp status #हनुमान जयंती #good morning
शुभ सकाळ - 8 0 हनुमान चालीसा || तिहुँ लोक उजागर INII जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा I१२II महाबीर बिक्रम बजरंगी। निवार @గడా 131 सुमति कुमति कंचन वरण विराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा II४ ]I  हाथ वज्र और ध्वजा विराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै II५।I शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन II६।I विद्यावान अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर II७II गुणी प्रभु चरित्र को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया Il8ll सुनिबे सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा I९१I भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे InOII लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुवीर उर लाये IM१II हरषि कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई In२II रघुपति सहस बदन तुम्हरो जस गावें। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं In३II  सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा I१४II दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि कहांते I५I सके कुबेर    लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुवीर हरषि ৪3 তো कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई In२II रघुपति सहस बदन तुम्हरो जस गावें। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं In३II  सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा I४II दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते IN५II कुबेर जम 8 0 हनुमान चालीसा || तिहुँ लोक उजागर INII जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा I१२II महाबीर बिक्रम बजरंगी। निवार @గడా 131 सुमति कुमति कंचन वरण विराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा II४ ]I  हाथ वज्र और ध्वजा विराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै II५।I शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन II६।I विद्यावान अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर II७II गुणी प्रभु चरित्र को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया Il8ll सुनिबे सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा I९१I भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे InOII लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुवीर उर लाये IM१II हरषि कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई In२II रघुपति सहस बदन तुम्हरो जस गावें। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं In३II  सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा I१४II दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि कहांते I५I सके कुबेर    लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुवीर हरषि ৪3 তো कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई In२II रघुपति सहस बदन तुम्हरो जस गावें। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं In३II  सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा I४II दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते IN५II कुबेर जम - ShareChat