जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १४☀️ पृष्ठ १५☀️
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी ।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना ।
भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥१॥
भगवान् का जन (सेवक) जान कर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा- हे तात हनुमान् ! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए ॥१॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी ।
अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।कपि केहिहेतु धरी निठुराई॥२॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान् ! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ॥२॥
सहज बानि सेवक सुखदायक ।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता ।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥३॥
सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथ जी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात ! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गों को देख कर मेरे नेत्र शीतल होंगे॥३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी।अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥४॥
[मुँह से] वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओं का] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं-] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देख कर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले-॥४॥
मातु कुसलप्रभु अनुज समेता।तवदुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित [शरीर से] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है ॥५॥
दो०- रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजी का संदेश सुनिये। ऐसा कह कर हनुमान्जी प्रेम से गद्गद हो गये। उनके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया ॥१४॥
#सीताराम भजन


