ShareChat
click to see wallet page
search
#santrampaljimaharaj #GodNightThursday #MakaraSankranti26 . सतगुरु महिमा सतगुरु दर्द बंद दर्वेसा, जो मन कर है दूर अंदेशा।। सतगुरु दर्द बंद दरबारी, उतरे साहिब सुन्य अधारी। सतगुरु साहिब अंग न दूजा, ये सर्गुण वै निर्गुन पूजा। गरीब निर्गुण सर्गुण एक है, दूजा भर्म विकार। निर्गुण साहिब आप हैं सर्गुण संत विचार।। सतगुरु कबीर परमेश्वर जी संत गरीब दास जी के सतगुरु थे। वे सुन्न में सत्यलोक में रहते है। वहाँ से नीचे उतरकर आए। वे हमारे दर्द को समझते हैं। वे सच्चे दरबारी अर्थात् पृथ्वी लोक पर वे अपना वेश तथा घर बदलकर आते हैं। अपने आपको परमेश्वर का दास बताते हैं, संत बताते हैं। संत जो सच्चा है, वह परमेश्वर के दरबार अर्थात् संसद भवन का प्रतिनिधि होता है। वह सच्चे दरबार की सब खबर रखता है। इसलिए कहा है कि सतगुरु हमारे दुःखों से दुःखी होता है। इसलिए यहाँ पृथ्वी पर आकर हमारा कष्ट निवारण करते हैं। सुखी होने की भक्ति विधि बताते हैं। ऐसा सतगुरु जो परमात्मा ही है, वह हमारे दुःख में दुःखी होने वाला दर्वेश है। सच्चा ज्ञान देकर हमारी सब आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान करके सब अंदेशा समाप्त कर देता है। वह सच्चा दरबारी अर्थात् परमेश्वर के कार्यालय का धुर का प्रतिनिधि है। ऐसा सतगुरु और साहेब एक ही होता है जो पृथ्वी पर प्रकट होकर सच्चा ज्ञान व भक्ति साधना बताता है, वह सगुण है और जो सत्यलोक में है हमें दिखाई नहीं देता, उसने कर्माधार विधान बनाकर छोड़ रखा है। इस आधार से सर्व प्राणी अपने किए कर्मों का फल प्राप्त करते रहते हैं। इसलिए वहाँ सत्यलोक में बैठे परमात्मा को निगुर्ण कहा जाता है। वैसे जब परमात्मा पृथ्वी पर संत रुप में आता है, तब वह भक्ति के मन्त्र जाप करने को देकर तथा आशीर्वाद देकर हमारे कर्मों में परिवर्तन कर देता है। वास्तव में सरगुण तथा निर्गुण दोनों एक ही परमात्मा है जो सतगुरु रुप में सत्य ज्ञान बताकर जाता है। बाद में वे वाणी उसी का स्वरुप होती हैं। तब साहिब निर्गुण रुप में अपने सत्यलोक में विराजमान रहता है। गुरू बिन वेद पढ़ै जो प्राणी, समझै न सार रह अज्ञानी। तत्वदर्शी संत अर्थात् पूर्ण गुरू की शरण में आए बिना यदि कोई वेदों को पढ़ता है, उसको सद्ग्रन्थों का सारज्ञान समझ नहीं आता। सद्ग्रन्थों के गूढ़ रहस्यों को न समझ कर अज्ञानी ही रह जाता है। श्री देवी पुराण में पृष्ठ नं. 414 पर प्रकरण है कि सत्ययुग के ब्राह्मण वेद के पूर्ण विद्वान थे। वे श्री देवी की पूजा करते थे। प्रत्येक गाँव में देवी का मंदिर बने, यह उनकी प्रबल इच्छा थी। पवित्र चारों वेदों में तथा वेदों के सारांश रूप पवित्र श्रीमद् भगवत गीता में कोई वर्णन नहीं है कि श्री देवी दुर्गा जी की पूजा करनी चाहिए। इससे प्रमाणित हो जाता है कि सत्ययुग के ब्राह्मणों को वेद ज्ञान नहीं था। फिर वर्तमान के ब्राह्मणों का तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उनको कितना वेद ज्ञान है क्योंकि इन्होंने अपने पूर्वजों से ही वेद ज्ञान प्राप्त हुआ है। सत्ययुग से लेकर कलयुग के प्रथम चरण तक किसी को वेद ज्ञान नहीं था। केवल परमात्मा को ही सर्व ज्ञान है। वह परमेश्वर प्रत्येक युग में प्रकट होकर यथार्थ अध्यात्मिक ज्ञान अपने मुख कमल से बोली अमृतवाणी द्वारा बताते हैं, वह लीपिबद्ध कर ली जाती है। वह सच्चिदानन्द घन ब्रह्म की वाणी कही जाती है। गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में 'ब्रह्मणः मुखे' शब्द लिखा, उसका अर्थ है कि 'सच्चिदानन्द घन ब्रह्म की वाणी में' यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञान विस्तार से कहा गया है, वह तत्वज्ञान है। उसी परमेश्वर ने सन् 1398 में प्रकट होकर सन् 1518 तक तत्वज्ञान कहा था जो उनके परम भक्त संत धनी धर्मदास जी ने लीपिबद्ध किया था, वह 'कबीर वाणी' है। इसी को तत्वज्ञान तथा सूक्ष्मवेद कहा जाता है। इसका ज्ञान भी मेरे सतगुरू अथार्त संत रामपाल दास जी महाराज से पहले कुछ परम् संतो को छोड़कर जिनको परमात्मा मिले थे, अन्य किसी को नहीं था। सब अज्ञानी थे। कोटिक तीर्थ सब कर आवै। गुरु चरणां फल तुरन्त ही पावै॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावै। जम की आंच ताहि नहीं आवै॥ भक्ति मुक्ति का पन्थ बतावै। बुरो होन को पन्थ छुड़ावै॥ सतगुरु भक्ति मुक्ति के दानी। सतगुरु बिना न छूटे खानी॥ पूर्ण परमात्मा द्वारा दिये तत्वज्ञान यानि सूक्ष्मवेद में कहा है कि तीर्थों और धामों पर जाने से कोई पुण्य लाभ नहीं। असली तीर्थ सतगुरु तत्वदर्शी सन्त का सत्संग सुनने जाना है। जहां तत्वदर्शी सन्त का सत्संग होता है, वह स्थान श्रेष्ठ तीर्थ धाम है। इसी कथन का साक्षी संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत महापुराण भी है। उसमें छठे स्कंद के अध्याय 10 में लिखा है कि सर्व श्रेष्ठ तीर्थ तो चित्त शुद्ध तीर्थ है। जहां तत्वदर्शी सन्त का सत्संग चल रहा है। उसके अध्यात्म ज्ञान से चित्त की शुद्धि होती है। शास्त्रोक्त अध्यात्म ज्ञान तथा शास्त्रोक्त भक्ति विधि का ज्ञान होता है जिससे जीव का कल्याण होता है। अन्य तीर्थ मात्र भ्रम हैं। इसी पुराण में लिखा है कि सतगुरु रूप तीर्थ मिलना अति दुर्लभ है। इस प्रकार पूर्ण सतगुरु से नाम दीक्षा लेकर केवल सर्पदंश से नहीं बल्कि काल के दंश से भी बचा जा सकता है। पूर्ण सतगुरु से नाम दीक्षा लें एवं सभी लाभों के साथ आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करें। वर्तमान में पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज हैं जिनकी शरण में अविलंब आएं और अपना जीवन सफल बनायें। कबीर, साथ समून्द्र की मसि करूं, लेखनि करूं बनिराय। धरती का कागज करू, गुरु गुण लिखा न जाय ll ऐसे सतगुरु की महिमा करने के लिए यदि सातों समुद्रों की स्याही करूं और सर्व वृक्षों को कलम बनाऊं तथा पूरी पृथ्वी जितना कागज बना लूं तो भी ऐसे सतगुरु की महिमा नहीं लिखी जा सकती। यदि कुत्ते के जीवन का कष्ट लिखें, फिर गधे के जीवन का कष्ट लिखें l फिर अन्य 84 लाख प्रकार के प्राणियों का कष्ट लिखें हैं जो सतगुरु जी ने नहीं होने दिया तो उपरोक्त कलम - दवात कागज कम पड़ेंगे। कबीर~ गुरु बडे गोविन्द से, मन मे देख विचार। हरि सुमरे सो वार है, गुरू सुमरे होए पार। कबीर~ मात पिता मिल जावेगे, लख चौरासी माही। गुरु सेवा और बंदगी, फेर मिलन की नाही। कबीर~ गुरु मानुष कर जानते, ते नर कहिए अंध। होए दुखी संसार मे,आगे काल का फंद।। జ్ఞాన గంగా
santrampaljimaharaj - महिमा सतगुरु महिमा सतगुरु - ShareChat