शास्त्र-विरुद्ध साधना और उसके परिणाम
महात्मा बुद्ध ने कठोर तपस्या और शरीर को कष्ट देने वाले मार्ग को अपनाया था, जिसे बाद में उन्होंने स्वयं भी त्याग दिया था। गीता जी के अध्याय 17 श्लोक 5-6 में स्पष्ट लिखा है कि जो मनुष्य शास्त्र-विधि को त्यागकर घोर तप करते हैं, वे अज्ञानी हैं और शरीर में स्थित परमात्मा को भी कष्ट देते हैं। संत रामपाल जी महाराज जी आज वही सरल और शास्त्र-अनुकूल भक्ति मार्ग बता रहे हैं जो वेदों और गीता जी में वर्णित है, ताकि साधक को बुद्ध जैसी भटकाव भरी तपस्या न करनी पड़े। #भक्ति भावनायें और ईश्वर आस्था


