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#हैप्पी गुरु रविदास जयंती #रविदास #🙏 जय रविदास
हैप्पी गुरु रविदास जयंती - संत रविदास का जीवन परिचय Woen by Uday गोवर्धनपुरा(वाराणसी) जन्मस्थान= 5= 1388 41 13985. 1 मृत्यु= १५२८ई. मृत्युस्थान= वाराणसी  ా उपनाम= रैदास 5 पिता= सन्तोरव दास माता= कलसा देवी शिष्या= मीराबाई भक्ति= निर्गुण ब्रह्म की जाति= चमार(जाटव) Vaar <r गुरु= रामानंद और कबीर साहेब पेशा= संत दार्शनिक समाज सुधारक मोची औरभगवान भाषाशैली= अवधी, राजस्थानी खड़ीबोली उर्दू, फारसी  संत रविदास के जन्म के विषय में सामान्यपरिचय विभिन्न भ्रांतियां हैं। कुछ विद्वान  इनका जन्म १३७७ई विद्वान  १३९८ई. मानते हैं। तथा कुछ १३८८ई.तथा कुछ रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। ये निर्गुण संप्रदाय के बहुत प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना समाज के व्यापक हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतःप्रोत थी। मूर्तिपूजा तीर्थयात्रा  % जैसे दिखावों में रविदास का बिल्कुल भी॰ ন থা] वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं। - चैनल को सब्सक्राइब करें  লিৎ ऐसी ही वीडियो पाने के संत रविदास का जीवन परिचय Woen by Uday गोवर्धनपुरा(वाराणसी) जन्मस्थान= 5= 1388 41 13985. 1 मृत्यु= १५२८ई. मृत्युस्थान= वाराणसी  ా उपनाम= रैदास 5 पिता= सन्तोरव दास माता= कलसा देवी शिष्या= मीराबाई भक्ति= निर्गुण ब्रह्म की जाति= चमार(जाटव) Vaar <r गुरु= रामानंद और कबीर साहेब पेशा= संत दार्शनिक समाज सुधारक मोची औरभगवान भाषाशैली= अवधी, राजस्थानी खड़ीबोली उर्दू, फारसी  संत रविदास के जन्म के विषय में सामान्यपरिचय विभिन्न भ्रांतियां हैं। कुछ विद्वान  इनका जन्म १३७७ई विद्वान  १३९८ई. मानते हैं। तथा कुछ १३८८ई.तथा कुछ रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। ये निर्गुण संप्रदाय के बहुत प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना समाज के व्यापक हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतःप्रोत थी। मूर्तिपूजा तीर्थयात्रा  % जैसे दिखावों में रविदास का बिल्कुल भी॰ ন থা] वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं। - चैनल को सब्सक्राइब करें  লিৎ ऐसी ही वीडियो पाने के - ShareChat