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#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - विवेकानंद के जीवन में उल्लेख है। विवेकानंद के पिता मरे। पिता मौजी आदमी थे। मौजी रहे होंगे , तभी विवेकानंद जैसा बेटा पैदा हो सका। कुछ बचाया नहीं, जिंदगी भर रहे। कमाया बहुत, मगर रहे। লুমান लुटाते जब मरे तो कर्ज छोड़ कर मरे। जो कुछ था वह कर्ज में चला गया। घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने को भी दो रोटी जुटाना मुश्किल। विवेकानंद अपनी मां को यह किसी के घर निमंत्रण कहकर चले जाते कि आज मुझे रहते। लौट कर किला है और रास्तों पर भूखे घूमते आते हाथ फेरते हुए, डकार लेते हुए। कहीं कोई मित्र ने निमंत्रण दिया नहीं है। मां को बताने के लिए कि पेट बहुत घर में थोड़ा भी गया है, तू फिकर मत कर, जो है, तू अब भोजन कर ले। क्योंकि वह इतना थोड़ा होता या तो विवेकानंद कर ले या मां कर ले। मस्त तगड़े आदमी थे, काफी भोजन चाहिए पडता। मां यह सोचकर कि बेटा भोजन कर आया है, भोजन कर लेती जो भी रूखा-सुखा होता। रामकृष्ण को खबर लगी तो रामकृष्ण ने एक दिन विवेकानंद को कहा कि तू पागल है! तू जा कर मंदिर विवेकानंद के जीवन में उल्लेख है। विवेकानंद के पिता मरे। पिता मौजी आदमी थे। मौजी रहे होंगे , तभी विवेकानंद जैसा बेटा पैदा हो सका। कुछ बचाया नहीं, जिंदगी भर रहे। कमाया बहुत, मगर रहे। লুমান लुटाते जब मरे तो कर्ज छोड़ कर मरे। जो कुछ था वह कर्ज में चला गया। घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने को भी दो रोटी जुटाना मुश्किल। विवेकानंद अपनी मां को यह किसी के घर निमंत्रण कहकर चले जाते कि आज मुझे रहते। लौट कर किला है और रास्तों पर भूखे घूमते आते हाथ फेरते हुए, डकार लेते हुए। कहीं कोई मित्र ने निमंत्रण दिया नहीं है। मां को बताने के लिए कि पेट बहुत घर में थोड़ा भी गया है, तू फिकर मत कर, जो है, तू अब भोजन कर ले। क्योंकि वह इतना थोड़ा होता या तो विवेकानंद कर ले या मां कर ले। मस्त तगड़े आदमी थे, काफी भोजन चाहिए पडता। मां यह सोचकर कि बेटा भोजन कर आया है, भोजन कर लेती जो भी रूखा-सुखा होता। रामकृष्ण को खबर लगी तो रामकृष्ण ने एक दिन विवेकानंद को कहा कि तू पागल है! तू जा कर मंदिर - ShareChat