*🔱 🌞 खरमास 2026: 14 मार्च से 14 अप्रैल तक क्यों रुक जाते हैं विवाह और शुभ कार्य? जानें नियम, महत्व और उपाय 🪔📿*
*✨ 🌼 खरमास 2026 14 मार्च से 14 अप्रैल तक रहेगा। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य क्यों नहीं किए जाते? जानें खरमास का ज्योतिषीय कारण, धार्मिक महत्व, व्रत-पूजन विधि और पौराणिक कथा। 🌞📖🪔*
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🌞 खरमास 2026 विशेष
14 मार्च से 14 अप्रैल 2026 तक
सूर्य देव को ग्रहों का राजा कहा जाता है। वे वर्ष भर में क्रमशः 12 राशियों में गोचर करते हैं और हर गोचर का पृथ्वी तथा मानव जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जब सूर्य देव बृहस्पति की राशियों, यानी धनु या मीन में प्रवेश करते हैं, तब उस अवधि को खरमास या मलमास कहा जाता है।
साल में दो बार खरमास आता है।
एक बार जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे धनुर्मास कहा जाता है, और दूसरी बार जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे मीन खरमास कहा जाता है।
📅 वर्ष 2026 में खरमास का समय
आरम्भ: 14 मार्च 2026, रात 01:01 बजे, सूर्य का मीन राशि में प्रवेश
समाप्ति: 14 अप्रैल 2026, सुबह 09:33 बजे, सूर्य का मेष राशि में प्रवेश
इस अवधि में सूर्य बृहस्पति की राशि में होने के कारण विवाह जैसे मंगल कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माने जाते।
🚫 खरमास में कौन-कौन से कार्य नहीं किए जाते
खरमास को परंपरागत रूप से शुभ कार्यों के लिए विराम का समय माना गया है। इस दौरान सामान्यतः निम्न कार्य नहीं किए जाते:
विवाह और सगाई
गृह प्रवेश
मुंडन संस्कार
यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार
नए घर या भवन का शुभारम्भ
विवाह मुहूर्त निर्धारित करते समय वर के लिए सूर्य का बल, वधू के लिए बृहस्पति का बल और दोनों के लिए चंद्रमा का अनुकूल होना आवश्यक माना जाता है। खरमास में यह संतुलन नहीं बनता, इसलिए विवाह से परहेज किया जाता है।
🪔 खरमास में क्या करना शुभ माना गया है
यह महीना धार्मिक साधना और आध्यात्मिक अभ्यास के लिए बहुत उत्तम माना गया है।
इस दौरान विशेष रूप से इन कार्यों का महत्व बताया गया है:
भगवान विष्णु या पुरुषोत्तम भगवान की पूजा
रामायण या भगवद्गीता का पाठ
विष्णु सहस्रनाम या विष्णु स्तोत्र का जप
रुद्राभिषेक या शिव पूजा
अन्न, वस्त्र, गुड़ और घी का दान
जो लोग पूरे महीने व्रत करते हैं, वे सामान्यतः एक समय सात्विक भोजन लेते हैं और साधना पर ध्यान देते हैं।
📖 खरमास से जुड़ी पौराणिक कथा
लोकमान्यता के अनुसार इस मास के पीछे एक रोचक कथा भी बताई जाती है।
कहा जाता है कि सूर्य देव अपने सात घोड़ों के रथ से निरंतर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते रहते हैं। एक बार लंबे समय तक यात्रा करने के कारण उनके घोड़े अत्यंत थक गए और प्यास से व्याकुल हो गए। सूर्य देव उन्हें पानी पिलाने के लिए एक सरोवर के पास रुक गए।
रुकने की अनुमति न होने के कारण सूर्य देव ने थोड़ी देर के लिए अपने रथ में घोड़ों की जगह गधों को जोड़ लिया। गधों के कारण रथ की गति धीमी हो गई। इसी कारण उस अवधि को खरमास कहा जाने लगा, क्योंकि संस्कृत में गधे को “खर” कहा जाता है।
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