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ghanshyam singh
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काशी करौत काहे लेही, बिना भजन नहीं ढंग रे। कोटि ग्रंथ का योहि अर्थ है, करो साध सत्संग रे ।।
##santrampalji maharaj
कबीर साहेब ने कहा है कि पंडितों के बहकावे में आकर भोली जनता ने काशी में करौत से गर्दन भी कटवा दी किंतु यह मोक्ष मार्ग नहीं है।
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