ना पूछो चश्म-ए-गवाही चलती-फिरती लाश से,
ज़िंदगी शर्मिंदा है अब मेरी हर इक साँस से।
धूप ने भी ओढ़ ली है रात की चादर यहाँ,
कौन टकराएगा अब टूटे हुए एहसास से।
शाम की दीवार पे साये भी सिसकने लगे,
हाँ मैं गुज़रा हूँ मगर अपने ही इतिहास से।
शीशे-ए-दिल में जमी, सर्द ख़ामोशी की धुंध,
मुलाक़ातें भी डरती हैं अब किसी ख़ास से।
हौसला जब रो पड़ा तन्हाई की गोद में,
मैंने रिश्ते काट डाले अपने ही विश्वास से।
तुम उजालों का शहर सजाते रह गए,
हम जले बैठे अपनी ही इक आस से।
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