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#अजब गज़ब होली की परम्परा
अजब गज़ब होली की परम्परा - ५०० सालों से यहां सास-बहू की होली का नजारा देखने 8 315 ச5ள के बुरहानपुर में मध्य प्रदेश  पुरानी ५०० साल अनोखी परंपरा যায ন্রমূ কী पुरानी ५०० साल होली   की अनोखी परंपरा निभाई निमाई क्षेत्न के इतवारा  स्थित गोकुल चंद्रमा मंदिर  जाती है। निमाड़ क्षेत्र के गोकुल म हर साल यह खास चंद्रमा मंदिर में सास और बहू एक आयोजन होता हे। मदिर  समिति क आदित्य को रंग लगाकर साथ दूसरे  मुखिया बताते हें कि यह  नृत्य करती हैं। परंपरा लगभग ५०० वष बरहानपुर। इस दिन परिवार के मनमुटाय भुलाकर प्रेम  से चली आ रही हे।इस दिन सास आर बहू अपने आर सद्ाव का सदेश दिया जाता हजारा लाग इस खास आयाजन को देखन क लिए मदिर मरिसर म जूटत सार गिल शिकय हैं सास और बहुएं रिश्तों में घुलता है प्यार झूमती  हे। साल एक बार होने वाला यह पर्व बुरहानपुर की মাথ भुलाकर मंदिर पहुंचती हें और साथ में रंग गलाल सांस्कृतिक पहचान बन चुका आपन सास बढ के म एक " होने याला यह आयोजन सिर्फ एक त्योहार नहीं  বরুন  मदिर म ठाकुर जो के दर्शन के बाद सास और बहू एकदूसरे को गुलाल लगाती झगडा की कहानिया लकिन मध्य प्रदश लगाती । मान्यता हेःकि सनी ढोँगी  साल ओर नृत्य का  बल्कि रिश्तों को गजबृत करने का जरिया भो हे। कहा जाता है कि इस  हें। फिर शूरू होता हैे लोकगीतों बरहानपुर मं एक ऐसी परपर  सिलसिला स्थानोय भापा मं गोत इस दिन मनमुटाव खत्म  जहा सास आर बह एकन्दूसरे को रंग लगाकर गले मिलती हें। यहां मनाई  ओर ढोल को शाप पर महिलाएं झूम रठता हे। यह नजारा देखन के दिन अगर सास बहू साथ रम रंग खेल रल ता उनके बीचका तनाव दूर कर प्रेम स होली खलन से गाए जात बहू को होली , जो करीब ५००  परिचार में सुख-शांति बनो  তানা अनोखी గకె STక TSTT స్థౌ|  हा जाता हे। यहा बजह हे कि इस खास होली का समी को बेसगी से सास लए बच्चास लकर নোযা ভম तक की চড়া n आयोजन के साक्षी बनते हे। परंपरा मानी जाती हे रहती पुरानी  साल इतजार रहता ५०० सालों से यहां सास-बहू की होली का नजारा देखने 8 315 ச5ள के बुरहानपुर में मध्य प्रदेश  पुरानी ५०० साल अनोखी परंपरा যায ন্রমূ কী पुरानी ५०० साल होली   की अनोखी परंपरा निभाई निमाई क्षेत्न के इतवारा  स्थित गोकुल चंद्रमा मंदिर  जाती है। निमाड़ क्षेत्र के गोकुल म हर साल यह खास चंद्रमा मंदिर में सास और बहू एक आयोजन होता हे। मदिर  समिति क आदित्य को रंग लगाकर साथ दूसरे  मुखिया बताते हें कि यह  नृत्य करती हैं। परंपरा लगभग ५०० वष बरहानपुर। इस दिन परिवार के मनमुटाय भुलाकर प्रेम  से चली आ रही हे।इस दिन सास आर बहू अपने आर सद्ाव का सदेश दिया जाता हजारा लाग इस खास आयाजन को देखन क लिए मदिर मरिसर म जूटत सार गिल शिकय हैं सास और बहुएं रिश्तों में घुलता है प्यार झूमती  हे। साल एक बार होने वाला यह पर्व बुरहानपुर की মাথ भुलाकर मंदिर पहुंचती हें और साथ में रंग गलाल सांस्कृतिक पहचान बन चुका आपन सास बढ के म एक " होने याला यह आयोजन सिर्फ एक त्योहार नहीं  বরুন  मदिर म ठाकुर जो के दर्शन के बाद सास और बहू एकदूसरे को गुलाल लगाती झगडा की कहानिया लकिन मध्य प्रदश लगाती । मान्यता हेःकि सनी ढोँगी  साल ओर नृत्य का  बल्कि रिश्तों को गजबृत करने का जरिया भो हे। कहा जाता है कि इस  हें। फिर शूरू होता हैे लोकगीतों बरहानपुर मं एक ऐसी परपर  सिलसिला स्थानोय भापा मं गोत इस दिन मनमुटाव खत्म  जहा सास आर बह एकन्दूसरे को रंग लगाकर गले मिलती हें। यहां मनाई  ओर ढोल को शाप पर महिलाएं झूम रठता हे। यह नजारा देखन के दिन अगर सास बहू साथ रम रंग खेल रल ता उनके बीचका तनाव दूर कर प्रेम स होली खलन से गाए जात बहू को होली , जो करीब ५००  परिचार में सुख-शांति बनो  তানা अनोखी గకె STక TSTT స్థౌ|  हा जाता हे। यहा बजह हे कि इस खास होली का समी को बेसगी से सास लए बच्चास लकर নোযা ভম तक की চড়া n आयोजन के साक्षी बनते हे। परंपरा मानी जाती हे रहती पुरानी  साल इतजार रहता - ShareChat