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#जय मां दुर्गा
`'देवीसूक्त' से यह विदित होता है कि साक्षात् परब्रह्म ही देवी आदि नामोंसे प्रख्यात है । स्वयं देवी कहती हैं –`
*"""अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।"""*
`अर्थात् 👉🏻 मैं ही रुद्र , वसु , आदित्यादिरूपसे विहरण करती हूँ । इन्द्र , अग्नि एवं अश्विनीकुमारोंको मैं ही धारण करती हूँ । सोम , त्वष्टा , पूषा , भग आदिको भी मैं ही धारण करती हूँ । देवताओंको हविः प्रदान करनेवाले यजमानको फल-प्रदान भी मैं ही करती हूँ ।`
*अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।*
*तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥*
[ `वेदोक्त देवीसूक्त ३` ]
`अर्थात् 👉🏻 समस्त जगत्की ईश्वरी , धन प्राप्त करानेवाली , तत्त्वज्ञानिनी तथा यज्ञार्थोंमें मैं ही मुख्य हूँ , मैं ही प्रपंचरूपसे स्थित हूँ । अतैव देवताओंने अनेक स्थानोंमें अनेक रूपसे मेरा ही विधान किया है ।`
*नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥*
*तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।*
*देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥*
*उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।*
`उपरोक्त साक्षात् ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त अर्थात – वागाम्भृणी सूक्त है – ये ८ ऋचाएँ वेद का हृदय हैं औऱ चित्र भी देवीसूक्त का साकार स्वरूप है🪷`
`ये सूक्त ऋग्वेद १०.१२५ का है । ऋषिका/वाक् , जो अम्भृण ऋषि की पुत्री हैं । पर जब ये सूक्त बोला , तब वे स्वयं ब्रह्म-स्वरूपा हो गईं – इसलिए इसे "आत्म-साक्षात्कार-सूक्त" कहते हैं ।`
`🌸 १. "अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि" – अद्वैत-घोषणा`
`देवी कहती हैं 👉🏻 ☆११ रुद्र , ☆८ वसु , ☆१२ आदित्य , ☆विश्वेदेव , ☆इन्द्र , ☆अग्नि , ☆अश्विनीकुमार – इन सब स्वरूपों में "मैं ही" विचरण करती हूँ ।`
`☆सोम , ☆त्वष्टा , ☆पूषा , ☆भग को "मैं ही" धारण करती हूँ ।`
`अर्थात 👉🏻 सारे/सभी/समस्त देवता मुझसे भिन्न नहीं हैं । शक्ति एवं शक्तिमान एक ही हैं । ब्रह्म ही देवी है ।`
`🌸 २. "अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्" – देवीसूक्त ३`
`राष्ट्री – मैं ही सम्पूर्ण जगत् की ईश्वरी/शासिका हूँ ।`
`संगमनी वसूनाम् – धन-ऐश्वर्य को जीव से मिलाने वाली मैं हूँ ।`
`चिकितुषी – मैं ही ब्रह्म-ज्ञान देने वाली हूँ ।`
`प्रथमा यज्ञियानाम् – यज्ञ में सबसे-पहले (सर्वप्रथम ) आहुति मुझे ही मिलती है 👉🏻 इसलिए दुर्गा-सप्तशती से पहले "अथ देव्याः कवचम्" पढ़ते हैं ।`
`भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् – मैं ही अनेक स्वरूपों में , अनेक स्थानों में प्रकट होती हूँ – ☆कहीं काली , ☆कहीं लक्ष्मी , ☆कहीं सरस्वती।`
`🌸 ३. दुर्गा-सप्तशती १.६४-६६ का प्रमाण –`
`"नित्यैव सा जगन्मूर्तिः तया सर्वमिदं ततम्"`
`अर्थात – देवी नित्य हैं , जन्म-मरण से परे हैं । जगत् उनका ही शरीर है ।`
`किन्तु देवताओं के कार्य के लिए जब प्रकट होती हैं , तब लोक में "उत्पन्न हुई" कही जाती हैं 👉🏻 जैसे महिषासुर-वध के लिए ।`
`🪔 चित्र का रहस्य –`
`१. बीच में सिंहारूढ़ा महिषासुरमर्दिनी 👉🏻 "या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता"`
`२. ऊपर ब्रह्मा-सावित्री , विष्णु-लक्ष्मी , शिव-पार्वती 👉🏻 "अहं रुद्रेभिः वसुभिः" का प्रमाण 👉🏻 त्रिदेव भी उन्हीं की शक्ति से सृष्टि-पालन-संहार करते हैं ।`
`३. देवी से पुष्प-वर्षा तथा आकाशगङ्गा 👉🏻 "तया सर्वमिदं ततम्" – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन्हीं से व्याप्त है ।`
`४. नीचे महिषासुर का वध 👉🏻 "देवानां कार्यसिद्धयर्थम् आविर्भवति सा यदा" का प्रत्यक्ष रूप ।`
`🌺 साधको हेतु भाव –`
`१. वेद कहता है 👉🏻 ☆रुद्र , ☆विष्णु , ☆इन्द्र सब देवी ही हैं । देवी ही परब्रह्म है ।`
`२. वही धन देती हैं , वही ज्ञान देती हैं , वही यज्ञ का फल देती हैं ।`
`३. वो अजन्मा हैं , किन्तु देव कार्य के लिए बारंबार प्रकट होती हैं ।`
`४. इसलिए नवरात्रि में हम "उत्पन्ना" नहीं ,अपितु "नित्या" जगदम्बा को पूजते है🙏🏻🚩`
`हे जगदम्बे ! "सास्मद्वाचं प्रसन्ना अलङ्करोतु" 👉🏻 जिसप्रकारसे आपने देवीभागवत के श्लोक में माँगा था , वही कृपा इस देवीसूक्त से भी माँगते हैं😊🪷`
`जगदम्बा अर्पणमस्तु🌹`
`श्रीमात्रे नमः🌹`
`नारायण`
`🪷🌷🪷`