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#भक्ति 💖
भक्ति 💖 - आत्मतत्त्व चिंतन मनुष्य अपने भीतर जो कुछ है, उसके मूल में वह स्वयं ही है। जहाँ " मैं" का बोध होता है ~ उसी को संस्कृत में " अहम्" कहा गया है। इसी " मैं" के वास्तविक स्वरूप को समझना ही आत्मचिन्तन का आरम्भ है। हम अपनी যঞ্ ম अंश उत्पत्ति पर विचार करें माता-पिता के के बाद किस सूक्ष्म शक्ति ने उन पर कार्य कर एक पहुँचने का निर्माण किया? निश्चय ही - बिना शक्ति তীবিন शिशु कोई कार्य नहीं होता। पर वह शक्ति कैसी है? विचार करते-करते बुद्धि वहाँ है जहाँ वह शक्ति निराकार, सर्वव्यापी और पहुँचती असीम प्रतीत होती है। सर्वव्यापी के अर्थ में यदि हम अपने " मैं॰ या " अहम्" पर विचार करें - क्या वह सर्वव्यापी हमारे इस " मैं" को छोड़कर है? उत्तर आता है नहीं | अर्थात् हम सभी उसी सर्वव्यापी चेतना के अंश हैं - या उसी के स्वरूप हैं। वेद उपनिषदों ने उसी सत्य को आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा कहा है। आत्मा वास्तव में अनेक नहीं - चेतना एक ही है, भिन्नता केवल शरीरों की है। उसी चैतन्य सत्य से " ऊँ" का स्पन्दन प्रकट हूआ और उसी से यह समस्त सृष्टि विस्तार कृपा से ही भाव से समर्पित होता है - तब परमात्मा की वह अपने परम सत्य को प्राप्त कर लेता है। "मैं" से " परम" तक की यात्रा - समर्पण और भक्ति #quf గlగౌ గ్గే: आत्मतत्त्व चिंतन मनुष्य अपने भीतर जो कुछ है, उसके मूल में वह स्वयं ही है। जहाँ " मैं" का बोध होता है ~ उसी को संस्कृत में " अहम्" कहा गया है। इसी " मैं" के वास्तविक स्वरूप को समझना ही आत्मचिन्तन का आरम्भ है। हम अपनी যঞ্ ম अंश उत्पत्ति पर विचार करें माता-पिता के के बाद किस सूक्ष्म शक्ति ने उन पर कार्य कर एक पहुँचने का निर्माण किया? निश्चय ही - बिना शक्ति তীবিন शिशु कोई कार्य नहीं होता। पर वह शक्ति कैसी है? विचार करते-करते बुद्धि वहाँ है जहाँ वह शक्ति निराकार, सर्वव्यापी और पहुँचती असीम प्रतीत होती है। सर्वव्यापी के अर्थ में यदि हम अपने " मैं॰ या " अहम्" पर विचार करें - क्या वह सर्वव्यापी हमारे इस " मैं" को छोड़कर है? उत्तर आता है नहीं | अर्थात् हम सभी उसी सर्वव्यापी चेतना के अंश हैं - या उसी के स्वरूप हैं। वेद उपनिषदों ने उसी सत्य को आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा कहा है। आत्मा वास्तव में अनेक नहीं - चेतना एक ही है, भिन्नता केवल शरीरों की है। उसी चैतन्य सत्य से " ऊँ" का स्पन्दन प्रकट हूआ और उसी से यह समस्त सृष्टि विस्तार कृपा से ही भाव से समर्पित होता है - तब परमात्मा की वह अपने परम सत्य को प्राप्त कर लेता है। "मैं" से " परम" तक की यात्रा - समर्पण और भक्ति #quf గlగౌ గ్గే: - ShareChat