ShareChat
click to see wallet page
search
कई हजार वर्षों तक स्वर्ग में निवास करने के बाद भी कर्म का लेखा पूर्ण नहीं हुआ था। एक समय ऐसा आया जब इंद्रदेव अपने स्वार्थ और सत्ता-रक्षा के लिए एक ऐसे निर्णय में उलझ गए जो धर्म और नीति की सीमा को छूता था। गुरु बृहस्पति जानते थे कि इंद्र का यह मार्ग धर्मसम्मत नहीं है, परंतु उन्होंने स्पष्ट विरोध नहीं किया। मौन रहकर समर्थन करना भी कर्म बन जाता है। यही सूक्ष्म सहयोग एक नया श्रॉफ बन गया। ⚖️ कर्म का निर्णय ब्रह्मलोक में पुनः विचार हुआ। ब्रह्मा जी बोले— “इस बार अहंकार नहीं, कर्तव्य से पलायन दोष है। जो मार्गदर्शक होते हैं, उनका मौन भी भारी होता है।” निर्णय हुआ कि गुरु बृहस्पति को फिर पृथ्वी पर जाना होगा— पर इस बार पक्षी नहीं, मनुष्य रूप में, ताकि वे स्वयं कर्म, मोह, परिवार और समाज सबका अनुभव कर सकें। 👶 धरती पर जन्म धरती पर उनका जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। न कोई दिव्य स्मृति, न स्वर्ग का वैभव— केवल संस्कार साथ आए। बाल्यकाल से ही उनके भीतर एक अलग सी गहराई थी। वे प्रश्न करते— “धर्म क्या है?” “सत्य कब मौन होता है?” “मार्गदर्शन का भार कितना होता है?” 🌾 जीवन की परीक्षा युवावस्था में उन्हें राजसभा में मंत्री बनने का अवसर मिला। अब फिर वही स्थिति— सत्ता, निर्णय और प्रभाव। एक बार राजा ने अधर्म से जुड़ा आदेश माँगा। सभा मौन थी। क्षणभर के लिए पूर्वजन्म का संस्कार जागा— मौन सुरक्षित है। #✈Last travel memories😎 पर तभी उनके भीतर पक्षी-जीवन की पीड़ा और स्वर्ग
✈Last travel memories😎 - ShareChat
00:52