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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २०☀️ पृष्ठ २१☀️ ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥ तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ ॥१॥ उसने हनुमान्जी को ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्ष से नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्‌जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाश से बाँध कर ले गया ॥१॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भवबंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥२॥ [शिवजी कहते हैं-] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमान्जी ने स्वयं अपने को बँधा लिया॥२॥ कपि बंधनसुनि निसिचर धाए।कौतुक लागि सभाँ सबआए॥ दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥३॥ बंदर का बाँधा जाना सुन कर राक्षस दौड़े और कौतुक के लिये (तमाशा देखने के लिये) सब सभा में आये। हनुमान्जी ने जा कर रावण की सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥३॥ करजोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥४॥ देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जी के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं ॥४॥ दो०- कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०॥ हनुमान्जी को देख कर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वध का स्मरण किया तो उसके हृदय में विषाद उत्पन्न हो गया ॥२०॥ #सीताराम भजन
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