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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ५ ☀️ पृष्ठ ६☀️ कीन्हिप्रीति कछुबीच न राखा।लछिमन रामचरित सबभाषा॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी । मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी ॥१॥ दोनों ने [हृदय से] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा। तब लक्ष्मणजी ने श्रीरामचन्द्रजी का सारा इतिहास कहा। सुग्रीव ने नेत्रों में जल भर कर कहा- हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायेंगी ॥१॥ मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा ॥ गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता॥२॥ मैं एक बार यहाँ मन्त्रियों के साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था। तब मैंने पराये (शत्रु) के वश में पड़ी बहुत विलाप करती हुई सीताजी को आकाशमार्ग से जाते देखा था॥२॥ राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा । पट उर लाइ सोच अति कीन्हा ॥३॥ हमें देख कर उन्होंने 'राम ! राम! हा राम !' पुकार कर वस्त्र गिरा दिया था। श्रीरामजी ने उसे माँगा, तब सुग्रीव ने तुरंत ही दे दिया। वस्त्र को हृदय से लगाकर श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत ही सोच किया ॥३॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा ॥ सब प्रकार करिहउँ सेवकाई । जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई ॥४॥ सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर ! सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मन में धीरज लाइये। मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूँगा, जिस उपाय से जानकीजी आकर आपको मिलें ॥४॥ दो०- सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥५॥ कृपा के समुद्र और बल की सीमा श्रीरामजी सखा सुग्रीव के वचन सुनकर हर्षित हुए। [और बोले- हे सुग्रीव ! मुझे बताओ, तुम वन में किस कारण रहते हो ॥५॥ #सीताराम भजन
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