प्रेम का अर्थ यह नहीं कि हर बात में सहमति हो।
प्रेम वहाँ शुरू होता है, जहाँ हम सामने वाले को उसके स्वभाव, सोच और सीमाओं के साथ स्वीकार कर लेते हैं।
जब हम किसी को बदलने की कोशिश छोड़ देते हैं और उन्हें जैसे हैं वैसे ही स्थान देते हैं, तब रिश्तों में हल्कापन आता है। असहमति रह सकती है, पर दूरी ज़रूरी नहीं होती।
स्वीकार भाव से दिया गया प्रेम दबाव नहीं बनाता, बल्कि सुरक्षा देता है। यही प्रेम रिश्तों को टिकाऊ और शांत बनाता है।
राधे राधे जी🙏🙏
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