ShareChat
click to see wallet page
search
#भगवत गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
भगवत गीता - वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै:| एवं रूपः शक्य अहंनलोके द्रष्टरंत्वदन्यन कुरुप्रवार। अर्जन! मनुष्य लोक मे इस प्रकार विश्व रूप वाला मैन वेद और यज्ञों के अध्ययन सेन दान से न क्रियाओं सि औरन उग्र तपों सि हीतेरे अतिरिक्त द्वारा देखा जा सकता हूँl४8 ]| दूसरे व्याख्याः श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि उनका 3 विराट रूप जो ब्रिह्माण्ड केसंपूर्णस्वरूप को समेटे हए है केवल भौतिक साधनों और धामिक अनृष्ठानोंकि द्वारा नहोंदेखाजा वेद, यज्ञ, अध्ययन , दान, और तपस्या जैसी धार्मिक सकता। लेकिनचे इस विराट रूप की दिव्यता और Gul Hేmuu उसकी व्यापकता को पकड़ने में असमर्थ हैं। श्रीकृष्ण का यह संदेश है कि इस दिव्य रूप को केवल एक विशेष् दृष्टिसेहीदेखा जा सकता हैजो किउनकी कृपा और दिव्य आशीर्वाद से ही संभव है। इसका अर्थःयह कि भगवान के विराट रूप की सच्ची अनुभति और अनुभव केलिए भक्ति समर्पण और ईश्वर की कृपा की आवश्यकता होतीहै न किकेवल धार्मिक क्रियाओं से। इस प्रकार  यह श्लोक हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि भगवान के विराट रूप को अनुभव करने के लिए केवल बाहरी साधनों और कर्मकांडों पर निरभर नहीं रहना चाहिए बल्कि इसके लिए एक गहरा आत्मिक अनुभव और आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै:| एवं रूपः शक्य अहंनलोके द्रष्टरंत्वदन्यन कुरुप्रवार। अर्जन! मनुष्य लोक मे इस प्रकार विश्व रूप वाला मैन वेद और यज्ञों के अध्ययन सेन दान से न क्रियाओं सि औरन उग्र तपों सि हीतेरे अतिरिक्त द्वारा देखा जा सकता हूँl४8 ]| दूसरे व्याख्याः श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि उनका 3 विराट रूप जो ब्रिह्माण्ड केसंपूर्णस्वरूप को समेटे हए है केवल भौतिक साधनों और धामिक अनृष्ठानोंकि द्वारा नहोंदेखाजा वेद, यज्ञ, अध्ययन , दान, और तपस्या जैसी धार्मिक सकता। लेकिनचे इस विराट रूप की दिव्यता और Gul Hేmuu उसकी व्यापकता को पकड़ने में असमर्थ हैं। श्रीकृष्ण का यह संदेश है कि इस दिव्य रूप को केवल एक विशेष् दृष्टिसेहीदेखा जा सकता हैजो किउनकी कृपा और दिव्य आशीर्वाद से ही संभव है। इसका अर्थःयह कि भगवान के विराट रूप की सच्ची अनुभति और अनुभव केलिए भक्ति समर्पण और ईश्वर की कृपा की आवश्यकता होतीहै न किकेवल धार्मिक क्रियाओं से। इस प्रकार  यह श्लोक हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि भगवान के विराट रूप को अनुभव करने के लिए केवल बाहरी साधनों और कर्मकांडों पर निरभर नहीं रहना चाहिए बल्कि इसके लिए एक गहरा आत्मिक अनुभव और आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। - ShareChat