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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ११☀️पृष्ठ १२☀️ राम बालि निजधाम पठावा। नगर लोगसब ब्याकुल धावा॥ नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है ॥१॥ तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥२॥ तारा को व्याकुल देख कर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु-इन पाँच तत्त्वों से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है ॥२॥ प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥ उपजा ग्यान चरन तबलागी। लीन्हेसि परम भगति बरमागी॥ वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌ के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया ॥३॥ उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं ॥ तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सबकीन्हा॥ [शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! स्वामी श्रीरामजी सबको कठ- पुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक-कर्म किया ॥४॥ राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई ॥ रघुपति चरन नाइकरि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा॥५॥ तब श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझा कर कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजी की प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले ॥५॥ दो०- लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥११॥ लक्ष्मणजी ने तुरंत ही सब नगरनिवासियों को और ब्राह्मणों के समाज को बुला लिया और [उनके सामने] सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया ॥११॥ #सीताराम भजन
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