आसमां से कौन आसमां को देखता है जमीन से हर कोई आसमां देखता है,
मंजिल की चाहत में ,
हर मर्तबा हम उस राह से दूर रहे
जिस राह से हर कोई शख़्स मंजिल को देखता है ।
चाहत कभी न रही मंजिल से मिलने की ,
अब तो मंजिल से खूबसूरत ये तन्हां रास्तों का सफ़र दिखता है ।
हम जिस किराए के मकान में जाकर ठहरेंगे ,
उस मकान के रौशनदान से दूर का रहने वाला चांद अभी से दिखता है।
दिल्लगी के इस बाजार में हम कैसे दिल लगाते ,
कोई ऐसा मिलता
मोहब्बत का प्यासा ,उम्र की हताशा लेकर ज़िंदगी के इस तन्हा सफर
में तो उससे प्यार करके देखते। ##साहित्यलेखन #साहित्यकविता#साहित्यलेखन #साहित्य #साहित्यकविता

