जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ९☀️ पृष्ठ १०☀️
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठिबैठ देखि प्रभुआगें॥
स्याम गात सिर जटा बनाएँ ।
अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ ॥१॥
बाण के लगते ही बालि व्याकुल हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। किन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को आगे देख कर वह फिर उठ बैठा। भगवान् का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाये हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाये हैं ॥१॥
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा ।
सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ॥
हृदयँ प्रीति मुखबचन कठोरा।बोला चितइ राम की ओरा॥२॥
बालि ने बार-बार भगवान् की ओर देख कर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचान कर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्रीरामजी की ओर देखकर बोला ॥२॥
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं ॥
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहिमारा॥३॥
हे गोसाईं ! आपने धर्म की रक्षा के लिये अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा ॥३॥
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥
[श्रीरामजी ने कहा-] हे मूर्ख ! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या-ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥४॥
मूढ़तोहि अतिसय अभिमाना।नारिसिखावन करसि न काना॥
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी ।
मारा चहसि अधम अभिमानी ॥५॥
हे मूढ़ ! तुझे अत्यन्त अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी कान (ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जान कर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा ॥५॥
दो०- सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि ।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि ॥९॥
[बालि ने कहा-] हे श्रीरामजी ! सुनिये, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अन्तकाल में आपकी गति (शरण) पा कर मैं अब भी पापी ही रहा ॥९॥
#सीताराम भजन


