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#✍️ साहित्य एवं शायरी #✍️ अनसुनी शायरी
✍️ साहित्य एवं शायरी - भूख जब चरम पर होती है कहां नजर धर्म पर होती है जाति- मजहब सब फालतू गति तो सदा कर्म पर होती है किसीके पहनावे से क्या फर्क बात तो सब शर्म पर होती है चोट देनेवाले को कौन पूछता है फसाद तो मरहम पर होती है कोई ऊपर है कि नहीं क्या पता आस्था तो सारी भ्रम पर होती है भूख जब चरम पर होती है कहां नजर धर्म पर होती है जाति- मजहब सब फालतू गति तो सदा कर्म पर होती है किसीके पहनावे से क्या फर्क बात तो सब शर्म पर होती है चोट देनेवाले को कौन पूछता है फसाद तो मरहम पर होती है कोई ऊपर है कि नहीं क्या पता आस्था तो सारी भ्रम पर होती है - ShareChat