जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ किष्किन्धाकाण्ड☀️ दोहा १८☀️ पृष्ठ १९☀️
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई ॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं ।
कालहु जीति निमिष महुँ आनौं ॥१॥
वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद् ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीताकी कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीत कर पल भर में जानकी को ले आऊँ ॥१॥
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई । तात जतन करि आनउँ सोई॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी ॥२॥
कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात ! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीव ने भी मेरी सुधि भुला दी ॥२॥
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥
जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा ।
ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥३॥
जिस बाण से मैंने बालि को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ ! [शिवजी कहते हैं -] हे उमा ! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है] ॥३॥
जानहिं यह चरित्र मुनिग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना।धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥४॥
ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है (जोड़ ली है), वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ा कर बाण हाथ में ले लिये ॥४॥
दो०- तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव ।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ॥१८॥
तब दयाकी सीमा श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात ! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखला कर ले आओ [उसे मारने की बात नहीं है] ॥१८॥
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