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santrampal ji maharaj - जैसी संगत, वैसी रंगत [ अपना दहोष दूसरे में दिखता है। परमात्मा पर विश्वास बिना भक्त अधूरा है। माँगकर खाना विरुद्ध है क्योकि यदि भक्त को श्रद्धा तथा भावना भी शास्त्र सच्ची है तो परमात्मा व्यवस्था कर देता है।  परंतु गृहस्थी के कर्म करके भोजन ग्रहण करना सर्वोत्तम है। साधु - संत का कर्म सत्संग करना , भक्ति करना है। यदि सच्ची श्रद्धा से करता है तो उसे माँगने की आवश्यकता नहीं पडेगी। जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज SatlokAshramshamliup JagatGuruRampalliorg SatlokShamiiup   जैसी संगत, वैसी रंगत [ अपना दहोष दूसरे में दिखता है। परमात्मा पर विश्वास बिना भक्त अधूरा है। माँगकर खाना विरुद्ध है क्योकि यदि भक्त को श्रद्धा तथा भावना भी शास्त्र सच्ची है तो परमात्मा व्यवस्था कर देता है।  परंतु गृहस्थी के कर्म करके भोजन ग्रहण करना सर्वोत्तम है। साधु - संत का कर्म सत्संग करना , भक्ति करना है। यदि सच्ची श्रद्धा से करता है तो उसे माँगने की आवश्यकता नहीं पडेगी। जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज SatlokAshramshamliup JagatGuruRampalliorg SatlokShamiiup - ShareChat