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#ધર્મ અને અધ્યાત્મ
ધર્મ અને અધ્યાત્મ - अंत मति सो गति अभी नहीं तो कभी नहीं जो करना है अब करना है ज्ञान योग के लिए समय जीवन के अभी ही निकालना है ६० वर्ष 7- #7/- सृष्टि के आदिकाल सतयुग को अमरलोक 1 ల कहा जाता है इसका अर्थ यह नहीं कि वहां किसी   की मृत्यु नहीं होती   परंतु రెడౌ अकाल मौत, कष्टदायक मौत नहीं इसलिए मौत का भय भी नहीं रहता। बड़ी क्या मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं खुशी से, आनंद से सरलता से एक शरीर मृत्यु टाली नहीं जा है हा। त्याग दूसरा नया शरीर धारण कर लेते हैं। १ जवाब सकती पर इस पर विजय जरूर प्राप्त कलयुग में आत्मा के बहुत पापकर्म इकट्ठे सकते हैं। विज्ञान ने बहुत प्रगति  हो जाते हैं इसलिए यहां कर दायक कष्ट की है जिससे जीवन को कुछ बढ़ाया जा मृत्यु, अकाल मृत्यु होती है और इसलिए सकता है लेकिन मृत्यु को टाल नहीं को मृत्युलोक कहा जाता है। कलयुग 4 T सकते। श्रेष्ठ कर्मो को सुखद गीता के आठवें अध्याय  में भगवान ने है। मृत्यु को सुधारने  बनाया जा सकता अर्जुन को मृत्यु के समय के चिंतन का के लिए जीवन को सुधारना जरूरी है। महत्व बताते हुए कहा कि अंत मति सो जैसे नाटक की समाप्ति के बाद सभी गति। मतलब सारा जीवन जहां आसक्ति कलाकार रंगमंच को छोड़़, नाटक वाले होगी अंत समय वही चिंतन होगा और ड्रेस को उतार कर अपने अपने घर चले मृत्यु के समय जो चिंतन होगा वैसा ही जाते हैं वैसे ही समग्र নিষ্ব नाटक का यह हमारा अगला जन्म होगा। इस बात को रहा है और हम अंतिम মল दृश्य सिर्फ एक जन्म के शरीर की मृत्यु इस आत्माओं को भी अपने इस शरीर रूपी सीमित अर्थ में न लेकर बेहद के अर्थ से कर अपने घर परमधाम वस्त्र को छोड़ यह  सारी सृष्टि के ही देखा  जाए तो जाने का समय समीप आ चुका है। हम परिवर्तन अथवा अंत का समय है जबकि यह नहीं कह सकते अभी मेरी आयु ही सभी आत्माओं की ही return journey है ? लेकिन नाटक ही समाप्त होने क्या है। तो क्या इस समय हमारी मति इतनी ৯ বমলিব মনক্ষী रंगमंच जा TEা श्रेष्ठ है जो गति भी श्रेष्ठ हो ? (stage) छोड़ कर जाना ही होगा। Brahmakumaris] अंत मति सो गति अभी नहीं तो कभी नहीं जो करना है अब करना है ज्ञान योग के लिए समय जीवन के अभी ही निकालना है ६० वर्ष 7- #7/- सृष्टि के आदिकाल सतयुग को अमरलोक 1 ల कहा जाता है इसका अर्थ यह नहीं कि वहां किसी   की मृत्यु नहीं होती   परंतु రెడౌ अकाल मौत, कष्टदायक मौत नहीं इसलिए मौत का भय भी नहीं रहता। बड़ी क्या मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं खुशी से, आनंद से सरलता से एक शरीर मृत्यु टाली नहीं जा है हा। त्याग दूसरा नया शरीर धारण कर लेते हैं। १ जवाब सकती पर इस पर विजय जरूर प्राप्त कलयुग में आत्मा के बहुत पापकर्म इकट्ठे सकते हैं। विज्ञान ने बहुत प्रगति  हो जाते हैं इसलिए यहां कर दायक कष्ट की है जिससे जीवन को कुछ बढ़ाया जा मृत्यु, अकाल मृत्यु होती है और इसलिए सकता है लेकिन मृत्यु को टाल नहीं को मृत्युलोक कहा जाता है। कलयुग 4 T सकते। श्रेष्ठ कर्मो को सुखद गीता के आठवें अध्याय  में भगवान ने है। मृत्यु को सुधारने  बनाया जा सकता अर्जुन को मृत्यु के समय के चिंतन का के लिए जीवन को सुधारना जरूरी है। महत्व बताते हुए कहा कि अंत मति सो जैसे नाटक की समाप्ति के बाद सभी गति। मतलब सारा जीवन जहां आसक्ति कलाकार रंगमंच को छोड़़, नाटक वाले होगी अंत समय वही चिंतन होगा और ड्रेस को उतार कर अपने अपने घर चले मृत्यु के समय जो चिंतन होगा वैसा ही जाते हैं वैसे ही समग्र নিষ্ব नाटक का यह हमारा अगला जन्म होगा। इस बात को रहा है और हम अंतिम মল दृश्य सिर्फ एक जन्म के शरीर की मृत्यु इस आत्माओं को भी अपने इस शरीर रूपी सीमित अर्थ में न लेकर बेहद के अर्थ से कर अपने घर परमधाम वस्त्र को छोड़ यह  सारी सृष्टि के ही देखा  जाए तो जाने का समय समीप आ चुका है। हम परिवर्तन अथवा अंत का समय है जबकि यह नहीं कह सकते अभी मेरी आयु ही सभी आत्माओं की ही return journey है ? लेकिन नाटक ही समाप्त होने क्या है। तो क्या इस समय हमारी मति इतनी ৯ বমলিব মনক্ষী रंगमंच जा TEা श्रेष्ठ है जो गति भी श्रेष्ठ हो ? (stage) छोड़ कर जाना ही होगा। Brahmakumaris] - ShareChat