#मानवता, जीवों पर दया
#ऐसी_काया_में_होरी_खेलियो....
ऐसी काया में होरी खेलियो,अहो मेरे साधो,
सनकादिक आन चाहि ....
ब्रम्हा विष्णु महेश्वर आये,नारद शुकदेव ब्यासा ।
ध्रुव प्रहलाद विभीषण आये,फगुवा खेलन की आशा ।।
कोटिक अनभै पाठ पढ़त हैं,कोटिक छन्द अछन्द ।
कोटिक सूरज करै आरती,कोटि कर जोड़ै चन्द ।।
सुलतानी वाजीद फरीदा, भरथरी गोपीचंद ।
काया नगर में फगुवा खेलै,काटैं जम किंकर के फंद ।।
धन्ना सुदामा पीपा आये,नामदेव और रैदास।
नानक दादू खेलत सन्तों,सतगुरू तख्त के पास ।।
उड़त गुलाल विशाल बिसंभर,रिमझिम रिमझिम रंग ।
अगर अबीर कबीर ख्वासा,जम जौरा जीतन जंग ।।
सुन्न विदेही शब्द सनेही,अविगत गति कूरबान ।
केशर की पिचकारी छुटै,शिव ब्रम्हा खेलै आन ।।
✓✓✓ असल होरी (होली) क्या होती हैं और
इसे कैसे खेला जाता हैं ?
कबीर ऐसी होली खेलिए,साँचा शब्द की मार।
काम क्रोध मद लोभ को,डारो हृदय निकार॥
यह जानने के लिए सपरिवार देखिए
"Sant Rampal Ji Maharaj"
YouTube channel पर स्पेशल सत्संग कार्यक्रम
"अथ होरी का अंग"


