ShareChat
click to see wallet page
search
*"अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष: उदासीनो गतव्यथ: ।""* जो न ही किसी व्यक्ति वस्तु स्थिति स्थान पर आश्रित है कि उसकी यह अपेक्षा कामना पूरी हो इनसे और जो अंदर बाहर से शुद्ध रहता है अर्थात मन बुद्धि चित्त अहंकार और शरीर का शौच करने में दक्ष है, अपने कर्म स्वभाव व्यवहार आचरण में मन को निर्मल योग्य प्रसन्न संतुष्ट संतुलित संयमित रखना जानता है अर्थात दक्ष है, उदासीन न चिपकता है किसी व्यक्ति वस्तु स्थिति स्थान परिस्थितियों में न घृणा अकड़ पकड़ में उलझता है अर्थात कोई ऋण धन इलेक्ट्रॉन विन्यास नहीं है उदासीन है तटस्थ है साक्षी भाव में स्थित है जैसे टाकिज सिनेमा हॉल में फिल्म में सब प्रकाश के पर्दे पर पट्टी में से गुजर कर जो जीवंतता है उसे मृत पट्टी में प्रकाश डाला गया है इसलिए जीवित दिखाई देता है यह अनोखा भ्रम पैदा किया गया है उसे मृत पट्टी जानकर उसमें अच्छा दृश्य बुरा दृश्य समझकर बंधता नहीं है उदासीन है और वह गतव्यथ: है अर्थात कोई भी सत्यता को स्वीकार नहीं किया सरकने वाले संसार की तो उसकी असर दिलो-दिमाग में कैसे टिकेगी मतलब वह सदा सदा के लिए व्यथा मुक्त हो जाता है गतव्यथ: है इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन- प्रसादे सर्व दुखानाम् हानि रस्योपजायते। इस असत् संसार को सत्य समझकर बंधता क्यों है इसे क्षणभंगुर नाशवान समझकर सदैव पुर्ण प्रसन्न संतुष्ट हो जा स्थितप्रज्ञ अर्थात प्रज्ञा को बराबर सत्य में स्थित करके कर्म कर मुझ परमेश्वर परमसत्य में जुड़ कर योगी हो जा। संतुष्ट: सततम् योगी अशांतस्य कुत: सुखम्। हे अर्जुन*" जिस काल में तेरी बुद्धि इस लोक और परलोक में सुने हुए और सुनने में आने वाले समस्त भोगों से भलीभांति वैराग्य को प्राप्त हो जायेगी उस काल में समय में तु मुझमें ही वास करेगा।""* श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा - संसृत मूल सूलप्रद नाना। संसृत - सरकने वाला क्षणिक इंद्रिय तृप्ति सुख संपत्ति वैभव सफलता का संसार जो मन में सुक्ष्म शरीर में बैठा है नाशवान का भरोसा अस्थाई आभासी दुनिया को स्थाई समझने का भ्रम पैदा हो गया है वहम वो संसार है, माया मात्रम् मनोमयम् है।दुसरी चौपाई में - जानहूं तबहीं जीव जग जागा।जब सब विषय विलास बिरागा। सुमति क्षुधा बाढहीं नित नई। विषय आस दुर्बलता गई।। श्री रामचरितमानस 🙏🏻 #भक्ति दर्शन #krishna #bhakti #🪐तत्वज्ञान #Gyan