मृगतृष्णा का जाल
शिवानी जैन एडवोकेट Byss #BYss
लोभ की अग्नि में जलता है जीवन सारा,
दौड़ता है मानव, जैसे कोई बेसहारा।
जितना समेटता है, उतना ही खाली होता,
शांति को खोकर, बस बेचैनी ही बोता।
सोने के महल भी उसे कम ही लगते हैं,
नींद उड़ी आँखों में, ख़्वाब दुःख के जगते हैं।
पर जिस दिन मन में संतोष का दीया जलता,
भीतर का कोलाहल, शांति बन के ढलता।
कण-कण में तब उसे प्रभु का वास दिखता है,
संतोषी ही असली भाग्य का लेख लिखता है।

