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#हैप्पी गुरु रविदास जयंती
हैप्पी गुरु रविदास जयंती - रबिदास का परिचय | नाम = संत रविदास उपनाम = रैदास 1398 కే: जन्म = गोवर्धनपुरा (वाराणसी) जन्म स्थान १५२८ ई मृत्यु वाराणसी मृत्युनस्थान far संतोरख दास 24| माता = कलसा मीराबाई शिष्या निर्गुण ब्रह्म की 9/5 जाति = चमार (जाटव) गुरु = रामानन्द और कबीर साहेब [ पेशा संत, दार्शनिक, समाज सुधारक और मोची भाषा-शैली = अवधी , राजस्थानी, खडी बोली, उर्दू संत रविदास के जन्म के विषय में विभिन्न भ्रांतिया  परिचय सामान्य विद्वान  १३७७ ई. तथा कुछ १३७८ ई. तथा कुछ है। कुछ इनका जन्म faz5 1398 $. সানন ;1 रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान याप्त किया निर्गुण संप्रदाय के बहुत प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन था।ये थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक న हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतनप्रोत थी। मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा जैसे [9ೆ೯' নিল্কল ' दिखावों में रविदास का वह व्यक्ति की 9 नःथा। आंतरिक भावनाओं और आपसी भाई-चारे को ही सच्चा धर्म मानते " व्यावहारिक  थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल प्रयोग  भाषा का किया है। रविदास को उपमा और रूपक अलंकार से विशेष प्रेम था। सीधे-साधे व्यदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए रबिदास का परिचय | नाम = संत रविदास उपनाम = रैदास 1398 కే: जन्म = गोवर्धनपुरा (वाराणसी) जन्म स्थान १५२८ ई मृत्यु वाराणसी मृत्युनस्थान far संतोरख दास 24| माता = कलसा मीराबाई शिष्या निर्गुण ब्रह्म की 9/5 जाति = चमार (जाटव) गुरु = रामानन्द और कबीर साहेब [ पेशा संत, दार्शनिक, समाज सुधारक और मोची भाषा-शैली = अवधी , राजस्थानी, खडी बोली, उर्दू संत रविदास के जन्म के विषय में विभिन्न भ्रांतिया  परिचय सामान्य विद्वान  १३७७ ई. तथा कुछ १३७८ ई. तथा कुछ है। कुछ इनका जन्म faz5 1398 $. সানন ;1 रैदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान याप्त किया निर्गुण संप्रदाय के बहुत प्रसिद्ध संत तथा कबीर के समकालीन था।ये थे। रविदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक న हितकारी तथा मानव प्रेम से ओतनप्रोत थी। मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा जैसे [9ೆ೯' নিল্কল ' दिखावों में रविदास का वह व्यक्ति की 9 नःथा। आंतरिक भावनाओं और आपसी भाई-चारे को ही सच्चा धर्म मानते व्यावहारिक  थे। रैदास ने अपनी काव्य रचना में सरल प्रयोग  भाषा का किया है। रविदास को उपमा और रूपक अलंकार से विशेष प्रेम था। सीधे-साधे व्यदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए - ShareChat