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#GodNightFriday #MakaraSankranti26 . निन्दा न करें कबीर~जो तू सेवक गुरून का, निन्दा की तज बात। निन्दक तेरे आय जब, कर आदर सनमान ।। कबीर~सातौ सागर मे फिरा, जम्बो दीप दे पीठ । पर निन्दा नाही करे, सो कोई बिरला दीप ।। कबीर~तिनका कबहु न निन्दिये, पांव तले जो होय। कबहूं उडि आंखे परे, पीर घनेरी होय।। निंदा के दो पक्ष हैं। पहला निंद्य, वह जिसकी निंदा की जा रही है और दूसरा निंदक, जो निंदा कर रहा है। परमात्मा कबीर साहिब जी ने निंदा के दोनों पक्षों पर गहरी दृष्टि से विचार किया है। निंद्य की दृष्टि से निंदा बुरी नहीं। इसमें निंद्य को उन बातों की जानकारी प्राप्त हो जाती है, जिसकी तरफ उसने कभीं ध्यान नहीं दिया था। यहाँ निंदक सहयोगी भूमिका में है, तब परमात्मा कबीर साहिब जी सहायक निंदक को आंगन में कुटी छवाय कर रखने का परामर्श देते हैं। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि कबीर~निन्दक दूर न कीजिए, कीजै आदर मान। निर्मल तन मन सब करै, बके आन ही आन।। कबीर ~निन्दक तो है नाक बिन, निसदिन विष्ठा खाय। गुन छाड़ै अवगुन गहै, तिसका यही सुभाय।। परमपिता परमात्मा कबीर साहिब जी ने निंदक को नासिका रहित बताते हुए कहा कि वह रात-दिन पराये लोगों के दोष रूपी मल का भक्षण करता है। वह लोगों के सद्गुणों की अवहेलना कर उनके दुर्गुणों को ही ग्रहण करता है और यही उसका स्वभाव बन जाता है। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते हैं कि अत्यधिक सम्पत्ति एवं स्त्री -मोह का त्याग कर साधु वेषभूषा धारण करना सहज है किन्तु दूसरों की निंदा का परित्याग करना बहुत ही कठिन है। विरला पुरुष ही इसका त्याग कर सकता है। कबीर~कंचन को तजबो सहल, सहल त्रिया को नेह। निंदा केरो त्यागबो, बड़ा कठिन है येह।। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि निंदक को हजारों पापियों से बड़ा पापी मानते हैं। वह जिसकी निंदा करता है, उसका पाप भी अपने सिर ले लेता है। वह अनुचित ही बोलता है क्योंकि वह आत्मज्ञानी नहीं होता। वह दया का पात्र है.साधु समाज में निंदक की प्रतिष्ठा नहीं होती। साधु पुरुष न तो निंदा करते हैं और न ही किसी की निंदा सुन सकते हैं। कबीर~जो कोई निन्दै साधु को, संकट आवै सोय। नरक जाये जन्मै मरै, मुक्ति कबहुँ नहिं होय।। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा न करो क्योंकि अभी तुमको आचरण और व्यवहार के ऊँचे स्तंभ पर चढ़ना है, न जाने भविष्य में क्या हो। कबीर~आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जाने क्या होय।। संत रविदास जी महाराज कहते है कि जेओहु अडसठ तीर्थ न्हावै, जे ओहु दुआदस सिला पूजावै। जे ओहु कूप तटा देवावै, करै निंद सभ बिरथा जावै।। साध का निंदकु कैसे तरे, सरपर जानहु नरक ही परै। जे ओहु ग्रहन करै कुलखेती, अरपै नारि सीगार समेति। सगली सिंमरिति सरवनी सुनै,करै निंद कवनै नही गुनै॥ जे ओहु अनिक प्रसाद करावै, भूमि दान सोभा मंडपि पावै। अपना बिगारि बिरांना सांढै, करै निंद बहु जोनी हांढै।। निंदा कहा करहु संसारा, निंदक का परगटि पाहारा। निंदकु सोधि साधि बीचारिआ, कहु रविदास पापी नर्क सिधारिया। इस वाणी मे संत रविदास जी महाराज पावन उपदेश देते हुए कहते है कि जीव को कभी भी संत महापुरुषो की निंदा नही करनी चाहिए। संत महापुरुषो की निंदा करने वाले चाहे जितना उपाय करले, उसे नरक मे जरुर जाना ही पडता है। यदि कोइ जीव अठसठ तीरथो पर स्नान करे , बारह शिलाओ की पुजा भी करे , चाहे वो जीवो की भलाई के लिए कुएं और तालाब बनवाए , यदि वह संतो की निंदा करता है तो यह सब कुछ किआ हुआ निषफल जाता है।संतो की निंदा करने वाला जीव कैसे भवसागर को पार कर सकता है ? उसको अवशय ही नरक मे जाना पडेगा। यदि कोइ कुरुक्षेत्र मे सूर्य ग्रहण के समय स्नान करे और अपनी स्त्री को सोलह श्रृंगार से सजा कर दान कर दे , सताइस समृतियो को कानो से सुनले, पर यदि वह जीव संत महापुरषो की निंदा करता है तो उस दवारा यह सब किया किसी काम नही आता। यदि कोइ जीव अनेकों प्रकार के प्रसाद बनाकर लोगो को भोजन कराए , अपनी भूमि दान कर सारे संसार मे प्रशंशा प्राप्त करले और अपना काम बिगाडकर दूसरो का काम संवार दे फिर भी यदि वो संत महापुरषो की निंदा करता है तो उसे बहुत सी योनियो मे भटकना पडता है। तन मन शीश ईश अपने पै, पहलम चोट चढावै। जब कोए राम भक्त गति पावै, हो जी हो जी।। सतगुरु तिलक अजपा माला, युक्त जटा रखावावै। जत कोपीन सत का चोला, भीतर भेख बनावै।। लोक लाज मर्याद जगत की, तृण ज्यों तोड़ बगावै। कामनि कनक जहर कर जानै, शहर अगमपुर जावै। ज्यों पति भ्रता पति से राती, आन पुरुष ना भावै। बसै पीहर में प्रीत प्रीतम में,न्यू कोए ध्यान लगावै। निन्दा स्तुति मान बड़ाई, मन से मार गिरावै। अष्ट सिद्धि की अटक न मानै, आगै कदम बढावै। आशा नदी उल्ट कर डाटै, आढा बंध लगावै। भवजल खार समुन्द्र में बहुर ना खोड़ मिलावै। गगन महल गोविन्द गुमानी, पलक मांहि पहुंचावै। नितानन्द माटी का मन्दिर, नूर तेज हो जाव।। एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था । राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था। उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी। तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला। तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई। किसी को कुछ पता नहीं चला। फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी। अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ। ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा ? राजा के खाते मे, जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है। रसोईया के खाते मे, जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है या वह चील के खाते मे, जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी। या वह साँप के खाते मे, जिसने अपनी आत्मरक्षा में ज़हर निकाला। बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका रहा। फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा। उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि देखो भाई जरा ध्यान रखना वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है। बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा। और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा । यमराज के दूतों ने पूछा कि प्रभु ऐसा क्यों? जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका भी नहीं थी। तब यमराज ने कहा कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं। पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला। ना ही उस रसोइया को आनंद मिला। ना ही उस साँप को आनंद मिला। और ना ही उस चील को आनंद मिला। पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला। इसलिये राजा के उस अनजाने पापकर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा। बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं। अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया ? ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं। జ్ఞాన గంగా #sant ram pal ji maharaj #me follow
sant ram pal ji maharaj - '೯$ +110 IIOM  कबीर,जौ तू सेवक गुरुन का, निन्दा की तज बान। निन्दक नेरे आय जब, कर आदर सनमान। । के सेवक होतो निंदा करने का स्वभाव यदि तुम श्रेष्ठ गुरुजनों त्याग दो और निंदा करने वाला जब निकट आएतो उसका तुम्हारे आदरसम्मान करो। Sant Rampal Ji Maharaj| सत रामपाल जीनिहाराज जीसे ApD Doumload কীনিতর निःशुल्क नामदीक्षा वनिःशुल्क  সুমবক সাচ জনে ক লিব মপব মুম : *91 749680/823 '೯$ +110 IIOM  कबीर,जौ तू सेवक गुरुन का, निन्दा की तज बान। निन्दक नेरे आय जब, कर आदर सनमान। । के सेवक होतो निंदा करने का स्वभाव यदि तुम श्रेष्ठ गुरुजनों त्याग दो और निंदा करने वाला जब निकट आएतो उसका तुम्हारे आदरसम्मान करो। Sant Rampal Ji Maharaj| सत रामपाल जीनिहाराज जीसे ApD Doumload কীনিতর निःशुल्क नामदीक्षा वनिःशुल्क  সুমবক সাচ জনে ক লিব মপব মুম : *91 749680/823 - ShareChat