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#गीता ज्ञान #गीता का ज्ञान #🙏गीता ज्ञान🛕 #श्री कृष्ण के गीता ज्ञान #🌺 कृष्ण ज्ञान 🙏 गीता वचन 🌺 भक्ति 💕 राधा कृष्ण 🙏🙏 हरि बोल 🙏🙏
गीता ज्ञान - कर्म का अर्थः कर्म का अर्थ है कार्य या क्रिया। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि हमें अपने कर्मों के अनुसार फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें अपने कर्तव्य का पालन चाहिए। करना निष्काम कर्मः गीता में निष्काम कर्म की बात कही गई है, जिसका अर्थ है कि हमें अपने लिए किसी भी प्रकार की इच्छा या कर्मों के लोभ नहीं रखना चाहिए। कर्म का फलः गीता में कहा गया है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है, लेकिन हमें उसके लिए चिंतित नहीं होना चाहिए। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनके फल पर। कर्म की तीन प्रकारः गीता में कर्म की तीन प्रकार बताई गई हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक कर्म वह है जो निष्काम भाव से किया जाता है, राजसिक कर्म वह है जो लोभ या इच्छा से किया जाता है, और तामसिक कर्म वह है जो अज्ञान या मोह से किया जाता है। कर्म का अर्थः कर्म का अर्थ है कार्य या क्रिया। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि हमें अपने कर्मों के अनुसार फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें अपने कर्तव्य का पालन चाहिए। करना निष्काम कर्मः गीता में निष्काम कर्म की बात कही गई है, जिसका अर्थ है कि हमें अपने लिए किसी भी प्रकार की इच्छा या कर्मों के लोभ नहीं रखना चाहिए। कर्म का फलः गीता में कहा गया है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है, लेकिन हमें उसके लिए चिंतित नहीं होना चाहिए। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनके फल पर। कर्म की तीन प्रकारः गीता में कर्म की तीन प्रकार बताई गई हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक कर्म वह है जो निष्काम भाव से किया जाता है, राजसिक कर्म वह है जो लोभ या इच्छा से किया जाता है, और तामसिक कर्म वह है जो अज्ञान या मोह से किया जाता है। - ShareChat