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bhakti - ক্রর্ম ক নীন মাস: त्याग का रहस्य भगवदू गीता का सार सच्चा त्यागी कौन है? जो कर्मफल का त्याग करता है वही सच्चा त्यागी है। (श्लोक १८/११ ) त्याग तीन प्रकार का होता है श्रीमद्धगवदगीता का यह अंतिम अध्याय सच्चे 'त्याग का रहस्य समझाता है। आधार पर त्याग सात्विक गुणों के इलका अर्थ कमों को छोड़ना नहीं वल्कि अपने कर्तव्य को फल की इच्छा के राजसिक और तामसिक होता है। विना करना है। यह अध्याय कर्म, ज्ञान और सुख को तीन गुणों के आधार पर (হলীক 18/4) वर्गीकृत करत्ता है, ताकि व्यक्ति को मुक्ति के भार्ग पर मार्गदर्रन निल सके।  तामसिक सात्विक राजसिक (Sattvic) (Rajasic) (Tamasic) कर्म कर्म க कर्तव्व शाव से॰ मोह ओर अलान अईकार ओर फल की हच्छा நாகிர से णिया गया =(18/23) (18/24) (18/25) ज्ञान SIN SII  प्राणियों में মন৭ কে एक ही कार्यको सत अविनाणी आत्या मेददेखना सब कुछ पानना ঐসনা (18/20) (18/21) (18/22) सुख सूख सुख शुरू और अंत में आरम्म में निष, आरप्पमें अमृत  अंत में अमृत সন স নি৭ দণকাযী (18/37) (18/38) (18/39) सिद्धि का मार्ग परम अपने स्वभाव-नियत கி समर्पण का फलः पूर्ण समर्पण करें कर्म का पालन करें परम शांति दोपयुक्त होने पर भी अपना  सभी शर्मो को त्यागकर केवल  ईश्वर की कृमा से ही परम शांति स्वाभाविक कर्म करक ओरठ है। ईश्वर की शरण में जाएं। और शाश्वत पद नान्त होता है। (হলীক 18/47) (হলীক 18/66)  (श्लोक १८/६२) 5ಗ>l ক্রর্ম ক নীন মাস: त्याग का रहस्य भगवदू गीता का सार सच्चा त्यागी कौन है? जो कर्मफल का त्याग करता है वही सच्चा त्यागी है। (श्लोक १८/११ ) त्याग तीन प्रकार का होता है श्रीमद्धगवदगीता का यह अंतिम अध्याय सच्चे 'त्याग का रहस्य समझाता है। आधार पर त्याग सात्विक गुणों के इलका अर्थ कमों को छोड़ना नहीं वल्कि अपने कर्तव्य को फल की इच्छा के राजसिक और तामसिक होता है। विना करना है। यह अध्याय कर्म, ज्ञान और सुख को तीन गुणों के आधार पर (হলীক 18/4) वर्गीकृत करत्ता है, ताकि व्यक्ति को मुक्ति के भार्ग पर मार्गदर्रन निल सके।  तामसिक सात्विक राजसिक (Sattvic) (Rajasic) (Tamasic) कर्म कर्म க कर्तव्व शाव से॰ मोह ओर अलान अईकार ओर फल की हच्छा நாகிர से णिया गया =(18/23) (18/24) (18/25) ज्ञान SIN SII  प्राणियों में মন৭ কে एक ही कार्यको सत अविनाणी आत्या मेददेखना सब कुछ पानना ঐসনা (18/20) (18/21) (18/22) सुख सूख सुख शुरू और अंत में आरम्म में निष, आरप्पमें अमृत  अंत में अमृत সন স নি৭ দণকাযী (18/37) (18/38) (18/39) सिद्धि का मार्ग परम अपने स्वभाव-नियत கி समर्पण का फलः पूर्ण समर्पण करें कर्म का पालन करें परम शांति दोपयुक्त होने पर भी अपना  सभी शर्मो को त्यागकर केवल  ईश्वर की कृमा से ही परम शांति स्वाभाविक कर्म करक ओरठ है। ईश्वर की शरण में जाएं। और शाश्वत पद नान्त होता है। (হলীক 18/47) (হলীক 18/66)  (श्लोक १८/६२) 5ಗ>l - ShareChat