२८ फरवरी १९४१ को, जब भारत में कैंसर का खास इलाज बहुत कम था, तब सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने एक बड़ा और अलग कदम उठाया—एक ऐसा अस्पताल बनाने का, जो पूरी तरह कैंसर के इलाज, पढ़ाई और रिसर्च के लिए हो।
टाटा मेमोरियल सेंटर सिर्फ़ इलाज की जगह नहीं था। शुरुआत से ही इसे ऐसे केंद्र के रूप में सोचा गया था जहाँ अच्छा इलाज, सीखने का मौका और नई जानकारी पर काम—तीनों साथ चलें। उस समय लगाया गया आधुनिक नर्स कॉल सिस्टम भी यही दिखाता था कि इलाज के साथ मरीज की देखभाल भी उतनी ही ज़रूरी है।
परेल में ८० बिस्तरों से शुरू हुआ यह अस्पताल आज कैंसर इलाज के क्षेत्र में एक अहम नाम बन चुका है—ज़्यादा लोगों तक इलाज पहुँचाते हुए और नए डॉक्टरों व विशेषज्ञों को तैयार करते हुए।
इसके स्थापना दिवस पर, हम उस सोच को याद करते हैं जिसने इसे शुरू किया था, और यह वादा दोहराते हैं कि हर व्यक्ति तक सुलभ और संवेदनशील कैंसर देखभाल पहुँचती रहे।
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