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#☝ मेरे विचार #📒 मेरी डायरी
☝ मेरे विचार - लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प जीव है। कभी यह वोट से चलता है, कभी नोट से, और कभी सीधे घेराव से। आजकल विरोध का पैमाना है ~ जो जितना जोर से घेर ले, वही उतना बड़ा नया मुद्दा क्या है, तथ्य क्या हैं - ये सब  योद्धा। " লীব্ূনাপ্সিক্ধ  बाद की बातें हैं, पहले कैमरा ऑन होना चाहिए।  हमारे देश में अब विरोध भी इवेंट मैनेजमेंट जैसा हो गया है। तख्त़ियाँ पहले छपती हैं, नारे बाद में तय होते हैं। और अगर सामने कोई बड़ा नेता हो - तो समझिए " लोकतांत्रिक उत्सव " 71 ಕ1 का बोनस संस्करण चल सोचिए आम आदमी बेचारा लाइन में खड़ा होकर फॉर्म भरता है शिकायत दर्ज कराता है, महीनों इंतज़ार करता है। और इधर कुछ लोग सीधे घेराव एक्सप्रेस से अपनी बात पहुँचाते हैं। लोकतंत्र भी शायद सोचता होगा ~ "मेरे नाम पर ये सब বরমা-নমা চী ২৪া ট!" व्यंग्य यह नहीं कि सवाल पूछे जा रहे हैं ~ सवाल पूछना तो लोकतंत्र की जान है। व्यंग्य यह है कि सवाल कमः तमाशा गया है। बहस कम, आरोप ज़्यादा  समाधान कम ज़्यादा शोर ज़्यादा आदमी की सुरक्षा  भी बड़ा मासूम है। उसे  ব্রূা সনাল अब आम कौन घेरेगा? उसके पास न तो मीडिया है॰ न माइक। उसे तो EMI, बिल और ट्रैफिक ही घेरे रहते हैं। उस पर आरोप  बस भी लगे तो घरवाले ही जज बन जाते हैं। शायद लोकतंत्र अब चुपचाप कोने में बैठकर यही सोच रहा है "मुझे चलाना था, तुमने मुझे चलाना ही बना दिया। " और जनता? भी उम्मीद में है कि कभी शोर से ज़्यादा समझ की वह आज সানাত মুনী  எரரிர் लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प जीव है। कभी यह वोट से चलता है, कभी नोट से, और कभी सीधे घेराव से। आजकल विरोध का पैमाना है ~ जो जितना जोर से घेर ले, वही उतना बड़ा नया मुद्दा क्या है, तथ्य क्या हैं - ये सब  योद्धा। " লীব্ূনাপ্সিক্ধ  बाद की बातें हैं, पहले कैमरा ऑन होना चाहिए।  हमारे देश में अब विरोध भी इवेंट मैनेजमेंट जैसा हो गया है। तख्त़ियाँ पहले छपती हैं, नारे बाद में तय होते हैं। और अगर सामने कोई बड़ा नेता हो - तो समझिए " लोकतांत्रिक उत्सव " 71 ಕ1 का बोनस संस्करण चल सोचिए आम आदमी बेचारा लाइन में खड़ा होकर फॉर्म भरता है शिकायत दर्ज कराता है, महीनों इंतज़ार करता है। और इधर कुछ लोग सीधे घेराव एक्सप्रेस से अपनी बात पहुँचाते हैं। लोकतंत्र भी शायद सोचता होगा ~ "मेरे नाम पर ये सब বরমা-নমা চী ২৪া ট!" व्यंग्य यह नहीं कि सवाल पूछे जा रहे हैं ~ सवाल पूछना तो लोकतंत्र की जान है। व्यंग्य यह है कि सवाल कमः तमाशा गया है। बहस कम, आरोप ज़्यादा  समाधान कम ज़्यादा शोर ज़्यादा आदमी की सुरक्षा  भी बड़ा मासूम है। उसे  ব্রূা সনাল अब आम कौन घेरेगा? उसके पास न तो मीडिया है॰ न माइक। उसे तो EMI, बिल और ट्रैफिक ही घेरे रहते हैं। उस पर आरोप  बस भी लगे तो घरवाले ही जज बन जाते हैं। शायद लोकतंत्र अब चुपचाप कोने में बैठकर यही सोच रहा है "मुझे चलाना था, तुमने मुझे चलाना ही बना दिया। " और जनता? भी उम्मीद में है कि कभी शोर से ज़्यादा समझ की वह आज সানাত মুনী  எரரிர் - ShareChat