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#गजल # 🇮🇳 वतन के रखवालो 🇮🇳 #वतन के दीवानो
गजल - वतन के दीवानो मोहब्बत देश से ऐसी कि खुद को वार आए हैं, वो खुद वतन की खाक में मिलकर को हार आए हैं। न देखा पीछे मुड़कर भी॰ न अपनों की फिकर की थी, वो अपनी जान का तोहफा सर-ए-बाजार आए हैं। हवाएं रो पड़ीं सुनकर, पहाड़ भी कांप उठे थे, बिछाकर लाश अपनी वो, नया अखबार आए हैं। वो सोए चैन से ताकि, वतन ये चैन से सोए, बदन पर ओढ़कर खुशबू, वो जां-निसार आए हैं। देखे, मगर हिम्मत नहीं टूटी, सितारे टूटते तिरंगे में लिपटकर वो, बड़े दिलदार आए हैं। वतन के दीवानो मोहब्बत देश से ऐसी कि खुद को वार आए हैं, वो खुद वतन की खाक में मिलकर को हार आए हैं। न देखा पीछे मुड़कर भी॰ न अपनों की फिकर की थी, वो अपनी जान का तोहफा सर-ए-बाजार आए हैं। हवाएं रो पड़ीं सुनकर, पहाड़ भी कांप उठे थे, बिछाकर लाश अपनी वो, नया अखबार आए हैं। वो सोए चैन से ताकि, वतन ये चैन से सोए, बदन पर ओढ़कर खुशबू, वो जां-निसार आए हैं। देखे, मगर हिम्मत नहीं टूटी, सितारे टूटते तिरंगे में लिपटकर वो, बड़े दिलदार आए हैं। - ShareChat