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#भक्ति 💖
भक्ति 💖 - सन् २१७७का-परम ब्रह्म परम प्रकाश॰ (पृष्ठ. .०१) निराकार आदिशक्ति माँ कापरम प्राकट्य छ ग पत्थलगांव में शक्ति स्वरूप एवं किरारी ड भक्ति स्वरूप के रूप में **प्राकट्य पुरुष - गुरु नहीं , प्रत्यक्ष परमात्म स्वरूप** 3f43 गुरु महिमा का नहीं, यह विषय साधारण परमात्म प्राकट्य के अद्वितीय रहस्य का है। गुरु वह होते हैं जो साधना से सिद्धि को प्राप्त हों, योग से ऊर्ध्वगमन करें तप से तेजस्वी बनें और अपनी अनुभूति का पथ जगत के लिये प्रशस्त करें। दिव्य पुरुष का है परन्तु यहाँ प्रसंग उस जिसने न तप किया, न योग साधा, न सिद्धि का संचय किया अपितु  जो जन्म से ही परमात्मिक से सम्पन्न रहा... गुणों और जिसमें स्वयं परमात्मा बिना आह्वान, बिना उपक्रम, बिना साधन - प्रकट हो गये। ऐसे महापुरुष को " गुरु" कहना भी सीमित कर देना है। क्योंकि गुरु मार्ग दिखाते हैं पर यहाँ तो उद्देश्य , यहाँ तो मंजिल स्वयं परमात्मा ही మ देह धारण कर खड़े हैं। जिस देह में परमात्मा प्रकट हुए a और उस महान प्राकट्य को वही देह, वही चेतना, वही व्यक्तित्व स्वयं धारण कर स्थिर कर ले - तो वह मनुष्य शरीर होकर भी केवल मनुष्य नहीं रहता। सिद्ध वह साधक नहीं - भी नहीं वह तो साक्षात् प्राकट्य है। भी मूल है। वह गुरु नहीं ~ गुरुओं রা अवतारों का भी आधार है। वह अवतार नहीं Fu का प्रत्यक्ष स्पर्श है। वह सगुण संकेत नहीं - सन् २१७७का-परम ब्रह्म परम प्रकाश॰ (पृष्ठ. .०१) निराकार आदिशक्ति माँ कापरम प्राकट्य छ ग पत्थलगांव में शक्ति स्वरूप एवं किरारी ड भक्ति स्वरूप के रूप में **प्राकट्य पुरुष - गुरु नहीं , प्रत्यक्ष परमात्म स्वरूप** 3f43 गुरु महिमा का नहीं, यह विषय साधारण परमात्म प्राकट्य के अद्वितीय रहस्य का है। गुरु वह होते हैं जो साधना से सिद्धि को प्राप्त हों, योग से ऊर्ध्वगमन करें तप से तेजस्वी बनें और अपनी अनुभूति का पथ जगत के लिये प्रशस्त करें। दिव्य पुरुष का है परन्तु यहाँ प्रसंग उस जिसने न तप किया, न योग साधा, न सिद्धि का संचय किया अपितु  जो जन्म से ही परमात्मिक से सम्पन्न रहा... गुणों और जिसमें स्वयं परमात्मा बिना आह्वान, बिना उपक्रम, बिना साधन - प्रकट हो गये। ऐसे महापुरुष को " गुरु" कहना भी सीमित कर देना है। क्योंकि गुरु मार्ग दिखाते हैं पर यहाँ तो उद्देश्य , यहाँ तो मंजिल स्वयं परमात्मा ही మ देह धारण कर खड़े हैं। जिस देह में परमात्मा प्रकट हुए a और उस महान प्राकट्य को वही देह, वही चेतना, वही व्यक्तित्व स्वयं धारण कर स्थिर कर ले - तो वह मनुष्य शरीर होकर भी केवल मनुष्य नहीं रहता। सिद्ध वह साधक नहीं - भी नहीं वह तो साक्षात् प्राकट्य है। भी मूल है। वह गुरु नहीं ~ गुरुओं রা अवतारों का भी आधार है। वह अवतार नहीं Fu का प्रत्यक्ष स्पर्श है। वह सगुण संकेत नहीं - - ShareChat