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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २२☀️ पृष्ठ २३☀️ जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ॥ समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥१॥ मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से युद्ध कर के तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान् जी के [मार्मिक] वचन सुनकर रावण ने हँस कर बात टाल दी ॥१॥ खायउँ फल प्रभु लागी भूखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥ सबकें देह परमप्रिय स्वामी।मारहिं मोहि कुमारग गामी॥२॥ हे [राक्षसों के] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरों के) मालिक ! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्ग पर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे ॥२॥ जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥ मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥३॥ तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे पुत्र ने मुझ को बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभु का कार्य किया चाहता हूँ। बिनती करउँ जोरिकर रावन।सुनहु मानतजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥४॥ हे रावण ! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़ कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़ कर भक्त भयहारी भगवान्‌ को भजो ॥४॥ जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई ॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥ जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहने से जानकीजी को दे दो॥५॥ दो०- प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥२२॥ खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे ॥२२॥ #सीताराम भजन
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