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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २३☀️ पृष्ठ २४☀️ राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका । तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥१॥ तुम श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में धारण करो और ल‌ंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो॥१॥ राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी।सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥ रामनाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोह को छोड़, विचार कर देखो। हे देवताओं के शत्रु ! सब गहनों से सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ों के बिना शोभा नहीं पाती॥२॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई ॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं ॥३॥ रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुईभी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥४॥ हे रावण ! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजी के साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥४॥ दो०- मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान । भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥२३॥ मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देने वाले, तमरूप अभिमानका त्याग करदो और रघुकुलके स्वामी, कृपा के समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का भजन करो ॥२३॥ #सीताराम भजन
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