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dhan nirankar ji🙏 - दिव्य वाणी বিথালনা हमारे मन भी विशाल हो जाएं॰ इनमें कोई तंगदिली न रहे क्योंकि तंगदिली ही हमेशा परेशान करती है। तंगदिली के कारण ही किसी बढ़ते हुए को देखकर जलन पैदा होती है कि मैं तो गरीब हूं वो दौलतमन्द कैसे हा गया ? यह सोच हमें सोने भी नहीं देती। इसके विपरीत जब विशालता हृदय में आ जाये तब इन्सान यही सोचता है कि हे प्रभु! मुझे पेट भर भोजन दिया है, লিৎ वस्त्र दिये हैं, सबको सबको दे, तन ढांकने के मुझे लिए जगह दी है, सबको दे। ऐसे दे, मुझे रहने के विशालता वाले गुरसिख के दिये हुए वरदान भी कभी खाली नहीं जाते। ७88e 9o8' ৪০ ममतामयी निरंकारी राजमाता जी पुस्तक- कुलवन्त, पृष्ठ-७६ दिव्य वाणी বিথালনা हमारे मन भी विशाल हो जाएं॰ इनमें कोई तंगदिली न रहे क्योंकि तंगदिली ही हमेशा परेशान करती है। तंगदिली के कारण ही किसी बढ़ते हुए को देखकर जलन पैदा होती है कि मैं तो गरीब हूं वो दौलतमन्द कैसे हा गया ? यह सोच हमें सोने भी नहीं देती। इसके विपरीत जब विशालता हृदय में आ जाये तब इन्सान यही सोचता है कि हे प्रभु! मुझे पेट भर भोजन दिया है, লিৎ वस्त्र दिये हैं, सबको सबको दे, तन ढांकने के मुझे लिए जगह दी है, सबको दे। ऐसे दे, मुझे रहने के विशालता वाले गुरसिख के दिये हुए वरदान भी कभी खाली नहीं जाते। ७88e 9o8' ৪০ ममतामयी निरंकारी राजमाता जी पुस्तक- कुलवन्त, पृष्ठ-७६ - ShareChat