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☺️उच्च विचार - सांख्य दर्शनः दुःख से मुक्ति का मार्ग सांख्य दर्शन यह समझाता है कि सभी दुःखों का मूल कारण शुद्ध चेतना (पुरुष) और भौतिक प्रकृति (प्रकृति) के बीच के भेद को न समझ पाना है। इन दोनों के वास्तविक स्वरूप को जानकर,  व्यक्ति परम मुक्ति ( केवल्य) प्राप्त कर सकता है।  हम दुःख क्यों भोगते हैं? मोक्ष का मार्ग समस्याः যমাথান; दुःख तीन प्रकार का होता है आपका वास्तदिक स्वरूपः शुद्ध, निष्विध्य साक्षी पुरुष आधिभौतिक  आध्यात्मिक आधिदैविक अन्य प्राणियों से देवीय शक्तियों से पुरूम शारीरिक मानसिक पुरूप प्रकृति के गुणों से परे, अकर्ता, निर्विकार " संसार का मूलः ओर केवल रृष्टा देखमे बाला) নীন যুত भ्रम ही वंधन का कारण है प्रकृति और आनगर সবে (যুত্র)  কান ক মুণ  रजस (ियाशीलता  प्रकृति जब पुरुष गलती से स्वर्य को प्रकृति के कार्यों का कर्ता- নসম (৭াচ] भोक्ता मान लेता है॰ तव बह दुःख का अनुभव करता है।  सृष्टि का क्रम प्रकृति से ही चलता है विवेक ज्ञान से कैवल्य (मुक्ति) विवेक ज्ञान अहंकार अनुमान प्रत्यक्ष आप्तवचन इन्द्रियाँ कैवल्य (मुक्ति) चह ज्ञान तीन प्रमार्णों ( प्रत्यश्ष अनुमान , आप्तवधन) द्वारा  पंचमहाभूत (स्थूल जगत) प्रकृति पुरुष के मेद को जानकर प्राप्त होत्ता हे।  6 NotcbookLI सांख्य दर्शनः दुःख से मुक्ति का मार्ग सांख्य दर्शन यह समझाता है कि सभी दुःखों का मूल कारण शुद्ध चेतना (पुरुष) और भौतिक प्रकृति (प्रकृति) के बीच के भेद को न समझ पाना है। इन दोनों के वास्तविक स्वरूप को जानकर,  व्यक्ति परम मुक्ति ( केवल्य) प्राप्त कर सकता है।  हम दुःख क्यों भोगते हैं? मोक्ष का मार्ग समस्याः যমাথান; दुःख तीन प्रकार का होता है आपका वास्तदिक स्वरूपः शुद्ध, निष्विध्य साक्षी पुरुष आधिभौतिक  आध्यात्मिक आधिदैविक अन्य प्राणियों से देवीय शक्तियों से पुरूम शारीरिक मानसिक पुरूप प्रकृति के गुणों से परे, अकर्ता, निर्विकार " संसार का मूलः ओर केवल रृष्टा देखमे बाला) নীন যুত भ्रम ही वंधन का कारण है प्रकृति और आनगर সবে (যুত্র)  কান ক মুণ  रजस (ियाशीलता  प्रकृति जब पुरुष गलती से स्वर्य को प्रकृति के कार्यों का कर्ता- নসম (৭াচ] भोक्ता मान लेता है॰ तव बह दुःख का अनुभव करता है।  सृष्टि का क्रम प्रकृति से ही चलता है विवेक ज्ञान से कैवल्य (मुक्ति) विवेक ज्ञान अहंकार अनुमान प्रत्यक्ष आप्तवचन इन्द्रियाँ कैवल्य (मुक्ति) चह ज्ञान तीन प्रमार्णों ( प्रत्यश्ष अनुमान , आप्तवधन) द्वारा  पंचमहाभूत (स्थूल जगत) प्रकृति पुरुष के मेद को जानकर प्राप्त होत्ता हे।  6 NotcbookLI - ShareChat